गुरुवार, 24 दिसंबर 2009

एक साल बीत गया.....

एक साल
आज पिछली पोस्टों को देखते हुए अचानक ही पहली पोस्ट पर गई तो चौंक पड़ी. २ दिसंबर २००८. यानी मुझे ब्लॉग जगत से जुड़े एक साल से भी ज्यादा हो गया!!!!

लगता ही नहीं कि एक साल हो गया. नई पोस्ट लिखने, पोस्ट करने और फिर प्रतिक्रियाएं जानने कि चाह में कब दिन महीनों, और महीने साल में तब्दील हो गए, पता ही नहीं चला. इस दौरान आप सबका जो स्नेह मिला, उसे बताने की ज़रुरत ही नहीं है. केवल और केवल आप सबके स्नेह के कारण ही मुझे कुछ नया लिखने कि प्रेरणा मिलती रही.

जानते हैं, मुझे ब्लॉग लिखने को किसने प्रेरित किया?

तब नेट मेरे लिए केवल जानकारियां एकत्रित करने का साधन मात्र हुआ करता था. एक दिन मैं नेट पर राजकमल प्रकाशन की पुस्तक सूची सर्च कर रही थी. तभी मेरी निगाह राजकमल के एक अन्य कॉलम "पुस्तक मित्र बनेंगे?" पर पड़ी. मैं तो हमेशा से ही पुस्तकों की मित्र रही हूँ. सोचा देखूं, कौन पुस्तक मित्र बना रहा है? इस पेज पर गई तो देखा की कोई फुरसतिया जी हैं, जिन्होंने राजकमल की पुस्तक-मित्र योजना की विस्तृत जानकारी दी है. तब ब्लॉगिंग मेरे लिए केवल सितारों के द्वारा किया जाने वाला कार्य होता था. मैं नहीं जानती थी की ये जानकारी मैं जहाँ पढ़ रही हूँ, उसे ब्लॉग कहते हैं.

खैर, मैंने भी वहां एक जिज्ञासा पोस्ट कर दी. लगे हाथों फुरसतिया जी का जवाब भी आ गया. बाद में अनूप जी ने मुझसे ब्लॉग बनाने को कहा. मैं अचकचाई. कैसे? क्या? कब? लेकिन अनूप जी ने राह सुझाई और मेरा ब्लॉग बन गया. बाद में मैंने ब्लॉग सजाने के बारे में कुछ जानकारियां चाहीं तो अनूप जी ने टका सा जवाब दे दिया- "हम खुद नहीं जानते." लेकिन तब से अब तक मेरी हर समस्या को अनूप जी सुलझाते रहे हैं, लिहाजा मेरे लिए गुरु तुल्य हैं

इसके बाद सिलसिला चल पड़ा.

कल जबकि मैं कानपूर जा रही हूँ, तो मेरे मन मैं अपनी बहन प्रियदर्शिनी, उसके पति सुनील, बच्चे अनमोल और यश से मिलने की उत्कंठा से कहीं ज्यादा ख़ुशी इस बात की हो रही थी की मैं फुरसतिया जी से, सुमन जी से मिल सकूंगी. लेकिन हाय री किस्मत!!! इधर २५ दिसंबर की शाम पांच बजे हम ट्रेन में बैठेंगे, और उधर फुरसतिया जी कानपुर से सपरिवार छुट्टियाँ बिताने यात्रा पर निकल पड़ेंगे!! यानी मुलाकात की कोई गुंजाइश नहीं. खैर, महफूज भाई ने लखनऊ आने का और मिलने का न्यौता दिया है अपनी इस दीदी को, सो हम कोशिश करेंगे की लखनऊ जा सकें और महफूज से मिल सकें.
जब ब्लॉग बना, तो मैंने मात्र एक सन्देश पोस्ट किया, जिस पर जिन मित्रों की टिप्पणियां आईं, उन्हें मैं कभी नहीं भूलूंगी -आप भी देखें-

प्रिय दोस्तो; इस ब्लोग के ज़रिये हो सकता है मेरे बहुत से पुराने साथी मिल जायें........हो सकता है बहुत से नये साथी बन जायें....वरना मुझ जैसे अदना से इन्सान को ब्लौग की क्या ज़रूरत थी......ज़रूरत महसूस हुई, केवल इसलिये कि मेरे लिखने-लिखाने वाले साथी जो अब पता नहीं कहां हैं, शायद टकरा जायें...... कुछ को तो मैं नियमित प्रकाशित होते देख रही हूं; लेकिन जो नहीं छप रहे, उन्होंने भी लिखना तो बन्द नहीं ही किया होगा....ऐसा विश्वास है मेरा......बस उन्हीं की तलाश में हूँ..........

"दोस्तों के नाम........."

8 टिप्पणियाँ - ब्लॉगर अनूप शुक्ल ने कहा…

वाह, बधाई! लिखना शुरू करने की बधाई!

९ दिसम्बर २००८ ६:५३ PM

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ब्लॉगर Bahadur Patel ने कहा…

bahut badhiya hai.likhate raho.

१७ फरवरी २००९ १२:१५ AM

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ब्लॉगर nai dunia ने कहा…

आप की सोच वाकई काबिले तारीफ है....

५ मार्च २००९ १:०५ AM

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ब्लॉगर manojkumarsingh ने कहा…

दोस्‍तो की तरफ से बधाई

१६ मार्च २००९ १२:१५ AM

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बेनामी उन्मुक्त ने कहा

स्वागत है चिट्ठजगत में, बहुत मित्र मिलेंगे।

३ अप्रैल २००९ ७:३६ PM

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ब्लॉगर गौरव मिश्रा ने कहा…

Aur aaj se hm bhi aapke follower ho gaye, aise hi apni achchi achchi rachnaayein laati rahiye...

११ अप्रैल २००९ १२:३१ PM

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ब्लॉगर Mai Aur Mera Saya ने कहा…

namashkar
mai yaha naya hu . likhta bhi naya hu .shayd apke bare me kisi dost se suna hu .. alok prakash putul ya richa se suna hu lagta hai..jo bhi ho app meri rachnao par kabhi tiapanni karengi ye socha na tha .. achha laga bahut achha laga.. apka bolg dekhkar kuch aur naya karne ko man hua .. karunga . mai photogrepher hu .. kaya yaha photo bhi lagaye ja sakte hai ...

२४ अप्रैल २००९ ६:४८ PM

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सोमवार, 14 दिसंबर 2009

याद न जाये, बीते दिनों की...

भाग- दौड़
कैसी भाग-दौड़ की ज़िन्दगी हो गई है.....|घड़ी के साथ उठना, घड़ी के साथ सोना, घड़ी के साथ आना- घड़ी के साथ जाना........|

इंसान न हुआ, घड़ी हो गया। घूमता रहता है, काँटों की तरह। हर वक्त " समय ही नहीं मिलता...", "फुरसत ही नहीं है...." जैसे जुमले मुंह पर सवार रहते हैं। और ये सच भी है। आज बड़े हों या बच्चे, सब इस कदर व्यस्त हो गए हैं की किसी को किसी की बात सुनने तक का टाइम नहीं।

मेरे घर में चार सदस्य हैं, और हम चारों अतिव्यस्त। बिटिया सुबह से लेकर रात तक पढ़ाई, स्कूल, ट्यूशन होमवर्क, मैं व्यस्त, पतिदेव अपनी फैक्ट्री में इतने व्यस्त की सुबह निकलते हैं और रात में आते हैं। मैं अपने काम पर सुबह सात बजे से जुटती हूँ, तो रात नौ बजे फुरसत होती हूँ। केवल अम्मा जी ( सास जी) फुरसत में होतीं हैं, तो उन्हें टीवी व्यस्त रखता है।

कमोबेश यही हाल हर परिवार का है। हमारी तरह सब अपने परिजनों का चेहरा रात में ही देख पाते हैं। अच्छा हुआ जो प्रकृति ने रात का विधान किया!!

आज के बच्चों को जब देखती हूँ, तो मुझे मेरा बचपन बहुत शिद्दत से याद आने लगता है।

कितना निश्चिन्त ..... कितना मासूम.... न पढ़ाई का ऐसा कमरतोड़ बोझ, न ट्यूशन की चिंता। स्कूल से आये तो बैग एक तरफ़ उछाला और जूते दूसरी तरफ....."मम्मे.....खाना......" का आदेश प्रसारित करती आवाज़ घर में गुंजाती।

इधर खाना अभी शुरू ही होता , कि उधर परदे के दोनों ओर से साथियों के चेहरे झांकने लगते। इशारे होने लगते कि जल्दी-जल्दी खाओ। मैं भी हबड़-तबड़ खाती। दौड़ के आधे-अधूरे हाथ धोती, और "मम्मे.....खेलने जा रहे हैं...." का एलान करती भाग जाती। पीछे से मम्मी आवाज़ देती रह जातीं।

हमारे खेल भी निराले थ॥ आज की तरह इलेक्ट्रोनिक का ज़माना तो था नहीं सो जो भी खिलौने थे अधिकतर खुद के तैयार किये उत्पाद होते थे। घर के आँगन में गुड्डे-गुड़ियों के बाकायदा घर बने हुए थे, जिन पर मेरी बड़ी दीदियों और उनकी सहेलियों का कब्ज़ा था, लेकिन दीदी की छुट्टी शाम को होती थी, सो तब तक उनकी गुड़ियों से हम खेलते। लेकिन गुड़ियों से हम बहुत देर तक नहीं खेलते थे , कारण मेरी मित्र -मंडली में लड़के भी थे, जो गुड़ियों से खेलना पसंद नहीं करते थे। किसी प्रकार मन मार के घर के गुड्डे से काम कराते रहते थे।
भाग-दौड़
दूसरा और हमारा बहुत प्रिय खेल था- "घर-घर"। तब हर घर में निबाड़ से बुने पलंग ज़रूर होते थे, जिन्हें गर्मियों में आँगन में बिछाया जाता था, इन्हीं पलंगों को खड़ा करके इनके घर बनाए जाते। मम्मी की साड़ियाँ पहनी जातीं। बाकायदा मम्मी, पापा, बच्चे, चाचा-चाची, पडोसी, बाई, सब्जी वाला, और टीचर जैसे रोल बांटे जाते। दीदियों की मौजूदगी में जब भी ये खेल खेला जाता तो मेरी बड़ी दीदी हमेशा टीचर बनतीं और हम सब को खूब मारतीं। मैं हमेशा सब्जी वाली बनती, और ढक्कनों से बनाई गई तराजू में कंकड़, पत्थर और पत्तों की सब्जी बेचती।

इसके अलावा हम बच्चे दोपहर में अपने घर की बाउंड्री में कंचे खेलते, गुल्ली-डंडा खेलते, और शाम होते ही "नमक-पाला" जैसा भारी दौड़ भाग वाला खेल खेलते। अँधेरा होते ही "आइस-पाइस" (आई-स्पाई) खेल जमता जो मम्मी की आवाज़ पर ही ख़त्म होता।

घर आते बैग उठाते, होमवर्क करते, कुछ थोडा बहुत याद भी करते और बस हो गई पढ़ाई।

रविवार को मम्मी-पापा दोनों घर पर होते , लिहाज़ा हमें कंचे या गुल्ली-डंडा खेलने का मौका नहीं मिलता, इस दिन हम सभ्य बच्चों की तरह कायदे में रहते और केवल लूडो, सांप-सीढ़ी या कैरम जैसे खेल खेलते। कैरम तो हमारे पापा भी साथ में खेलते थे और क्या खूब खेलते थे। आज भी वे बहुत बढ़िया खेलते हैं।
भाग-दौड़
शैतानियाँ भी हमारी काम न थीं. ये अलग बात है की घर में हम हमेशा सबसे शांत और कोमल बच्ची के रूप में गिने गए, लेकिन गुपचुप शैतानियाँ हमने भी खूब कीं। वैसे हम बहनों में मेरी बड़ी दीदी सबसे ज्यादा शैतान थीं। अपने ग्रुप की लीडर। जो बच्चा उनकी बात न माने उसकी खैर नहीं। दूसरे मोहल्ले की लड़कियों को ललकारती की दम है तो शाम को मंदिर में मिलना। और फिर अपनी फौज के साथ उस टोली की जो दुर्गत करतीं , उसके हम चश्मदीद गवाह है। चूंकि हम छोटे थे, सो हमें मंदिर के अन्दर बंद कर दिया जाता और खुद मंदिर के चबूतरे पर घमासान में जुट जातीं।

ऊंचे-ऊंचे इमली के पेड़ों पर सरपट चढ़ जातीं , साइकिल पर करतब दिखातीं। सर्कस देख के आने के बाद घर में बाकायदा सर्कस होता। अस्थाई झूला बाँधा जाता और उस पर उल्टा लटकाया जाता।

मेरी दीदी कहीं भी जातीं, साथ में मुझे ले जाना अनिवार्य था। मैं मन मारके जाती। दीदी भी कहाँ ले जाना चाहती थीं, लेकिन क्या करें? उस समय माँ के आदेश को टाला नहीं जाता था।

बड़ी दीदी के बाल बेहद लम्बे और खूबसूरत थे। कहीं जातीं तो मम्मी उनकी छोटी बना देतीं। लेकिन दीदी घर से ज़रा आगे पहुँचते ही अपनी चोटी खोल देतीं। मेरी उपस्थिति का भान होते ही मुझे मम्मी से न बताने के एवज में दस पैसे की रिश्वत दी जाती।

ऐसी ही रिश्वत तब भी दी जाती जब दोनों दीदियाँ अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने का प्रोग्राम बनातीं । मुझे पुछल्ले की तरह फिर लटकाया जाता, फिर रिश्वत दी जाती, लेकिन इस बार फिल्म न जाने के लिए रिश्वत दी जाती। मेरा मन वैसे भी फिल्म देखने में तब लगता नहीं था। शायद ज्यादा छोटी थी। कुछ समझ में तो आता नहीं था, सो टॉकीज़ के प्रोजेक्टर रूम के बाहर की बालकनी में फिल्म के कटे हुए टुकड़े बीनती रहती। ऐसे में रिश्वत लेकर फिल्म जाने से मुकर जाना फायदे का सौदा होता था।
भाग-दौड़
एक रिश्वत और कभी नहीं भूलती............दीदी और उनकी सहेलियां "सूरज" फिल्म देख के लौटी। मेरी दीदी और उनकी मंडली के बीच बहुत लोकप्रिय खेल था, "गुलाम-चोर-डंडा। ये खेल उसी ऐतिहासिक मंदिर के मैदान में उगे विशालकाय बरगद के पेड़ के इर्द-गिर्द होता, जहाँ घमासान हुआ करते थे। वहीँ दीदी की मित्र उषा जोशी रहतीं थीं। वे भी अपने भाइयों समेत इस खेल में शामिल होतीं थीं। उस वक्त की सबसे अच्छी बात यही थी की लड़के-लड़कियों के बीच विभाजन रेखा नहीं थी। सब मिलजुल के खेलते थे। बराबरी से लड़ते थे। तो उषा दीदी के बड़े भैया भी गुलाम चोर डंडा खेलते थे। जिस रोज़ ये सब सूरज फिल्म देख के आये, उसके अगले दिन जब खेल जमा, तो हमने देखा की प्रकाश भैया मेरी खूबसूरत दीदी को देख के गा रहे हैं-" चेहरे पे गिरी जुल्फें, कह दो तो हटा दूँ मैं, गुस्ताखी माफ़.........." हालाँकि मैं कुछ नहीं समझी, लेकिन इस गीत और दीदी के बीच मैं फिर मौजूद थी। मूसरचंद की तरह। बहुत बाद में समझ आया, जब दीदी ने खुद मज़े ले लेकर ये किस्सा सुनाया। आज भी इस किस्से को और भी कई किस्सों को वे बड़ा रस ले के सुनातीं हैं।

कहाँ से कहाँ पहुँच गई। बात कर रही थी आज के बच्चों और उनकी व्यस्तताओं की। आज की शिक्षा-प्रणाली ने बच्चों को कोल्हू का बैल बना दिया है। पढाई हमारे समय में भी होती थी, लेकिन पाठ्यक्रम का अनावश्यक बोझ नहीं होता था। तब के पढ़े हुए हम आज के बच्चों को पढ़ा रहे हैं, मतलब हमारी शिक्षा में कोई कमी नहीं है। वर्ना आजके बच्चों को पढ़ा ही न पाते। समय के साथ-साथ बदलाव होगा ही, लेकिन अनावश्यक बदलाव की क्या ज़रुरत है? आज पता नहीं कितनी अतिरिक्त किताबें कोर्स में लगा दी जातीं हैं, जिन्हें पूरी तरह पढाया भी नहीं जाता, लेकिन पेपर होता है। बच्चे के लिए तनाव पर्याप्त।

पहले रिज़ल्ट फर्स्ट डिवीज़न, गुड सेकण्ड , सेकंड डिवीज़न, थर्ड डिवीज़न जैसा बोला जाता था। लेकिन अब? अब तो पर्सेंटेज बोला जाता है. पहले ६०-६५ बहुत था, अब ८० भी कम गिना जाता है। बच्चा दिन-रात ९० -९५ की दौड़ में जुटा रहता है। पढ़ाई का तनाव, होम वर्क का तनाव, परीक्षाओं का तनाव, क्लास में रैंक बनाए रखने का तनाव ऊपर से माँ- बाप की इच्छाओं का तनाव। "बेटा, फलाना प्रतिशत आना ही चाहिए. " और " हम तुम्हारे लिए पानी की तरह पैसा बहाते हैं, और तुम पढ़ तक नहीं सकते?"
भाग-दौड़
आजके बच्चे जिस दौर से गुज़र रहे हैं, उसमें उन्हें तनाव के अलावा और कुछ नहीं मिल रहा। मनोरंजन के नाम पर टीवी या फिर नेट की दुनिया। लड़के तो फिर भी बाहर कुछ खेल-कूद ही लेते हैं, लेकिन लडकियां? अब मिलजुल के खेलने का समय नहीं रहा। इनडोर गेम्स के लिए ही अकेले लड़कियों को भेजते माँ-बाप डरते हैं। मेरी बिटिया खुद कत्थक सीखती है। दो अन्य बच्चियों के साथ शाम को डांस-क्लास जाती है. लेकिन जब तक लौट नहीं आती, मेरे प्राण उसी में अटके रहते हैं। समय बदला है, बदलाव ज़रूरी भी हैं, लेकिन ये बदलाव सुखद हैं? क्या इन्हें सुखद नही बनाया जा सकता? बच्चों का बोझ कुछ काम नहीं किया जा सकता? वे भी खुली सांस ले सकें? अपना बचपन जी सकें?

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

बांधवगढ की सैर और शेर के दर्शन

दीपावली
मई में अचानक ही राजा (डॉ.सुजीत शुक्ल ) का फोन आया, बांधवगढ़ चलना है. मैंने कहा की मई में तो मेरे "ग्रीष्मकालीन भ्रमण कार्यक्रम" तय हैं. रिज़र्वेशन भी हो चुके हैं. राजा बोला " चलो, जून में चलते हैं. लेकिन इसके आगे नहीं. अपने कार्यक्रम १० जून तक समेट लो, भैया से भी बोलो छुट्टियां तैयार रखें. कोई बहाना नहीं. "

अधिकार सहित दिए गए इस आदेश की अवहेलना संभव थी क्या? अपने डेढ़ महीने के कार्यक्रम को एक महीने में समेटा और १० जून को वापस आ गए, सतना. ११ जून को राजा ,और मेरी बुआ सास (राजा की मम्मी) मुंबई से सतना पहुँच गए. अगले दिन हमें बांधवगढ़ के लिए बड़े सबेरे निकलना था.

बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है.
बांधवगढ़ पहुँचने के लिए विन्ध्य पर्वत श्रृंखला को पार करना होता है. इतने घने और हरे जंगल पूरी पर्वत श्रृंखला पर हैं, कि मन खुश हो जाता है. हमारी गाडी पहाडियों पर सर्पिल रास्तों से होती हुई आगे बढ़ रही थी. इतना सुन्दर दृश्य!! वर्णनातीत ! इसी पर्वत श्रृंखला में है मोहनिया घटी, जहाँ पहली बार सफ़ेद शेर मिला, इसीलिए उसका नाम मोहन रखा गया.


सुबह १० बजे हम बांधव गढ़ पहुंचे. राजा ने पहले ही सत्येन्द्र जी के रिसोर्ट में बुकिंग करा ली थी. हम सीधे वहीं पहुंचे, जहाँ सत्येन्द्र जी और उनकी ब्रिटिश पत्नी "के" ने हमारा आत्मीय स्वागत किया.

ये रिसोर्ट इतनी खूबसूरत जगह पर है कि यहाँ से बाहरी दुनिया का अहसास ही नहीं होता. लगता है कि हम बीच जंगल में हैं. अलग-अलग बने खूबसूरत कॉटेज घाना बगीचा, आम्रपाली के अनगिनत पेड़, और उन पर लटके बड़े-बड़े असंख्य आम...अनारों से लादे वृक्ष...बहुत सुन्दर स्थान. मन खुश हो गया. देर तक सत्येन्द्र जी और के दोनों ही हमारे साथ गप्पें करते रहे. लंच के बाद सत्येन्द्र जी ही हमें नेशनल पार्क कि पहली साइटिंग पर ले गए. और जंगल के बारे में अमां जानकारियां दिन. अद्भुत ज्ञान है उन्हें जंगल और जंगली जीवों का. पहले दिन तो हम जंगल कि खूबसूरती ही देखते रह गए...हिरन और चीतल जैसे जानवर भी मिले. शेर के पंजों के निशान भी मिले...... इतने घने जंगल............क्या कहें...

दूसरे दिन सुबह चार बजे हम उठ गए और साढे चार बजे जंगल कि तरफ अपनी सफारी में निकल लिए. किस्मत अच्छी थी............दो राउंड के बाद ही शेर के दर्शन हो गए.
हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई
आराम फरमाता शेर......हम बांधवगढ में थे और अलस्सुबह ही हमें शेर के दर्शन हुए थे। उसकी गुर्राहट कानों में अभी भी गूंज रही थी। शाम की साइटिंग के बाद हमने कुछ शौपिन्ग की और रात दस बजे के आस-पास अपने रिसोर्ट पहुंचे। साढे दस बजे वेटर ने डिनर लगा दिये जाने की सूचना दी। हम सब डाइनिंग स्पेस की तरफ बढे। डाइनिंग स्पेस.... पर्यटकों को जंगल का अहसास दिलाने के लिये पूरा रिसोर्ट ही घने जंगल जैसा था , लेकिन ये स्पेस तो केवल आधी-आधी दीवारों से ही घिरा था. खैर... हम डिनर के लिये पहुंचे.अभी हम खाना प्लेटों में निकाल ही रहे थे, कि कुछ गहरी सी, गुर्राहट सी सुनाई दी. सब ने सुनी, मगर किसी ने कुछ नहीं कहा.एक बार...दो बार...तीन बार.... अब बर्दाश्त से बाहर था.... आवाज़ एकदम पास आ गई थी। मेरी बेटी ने पहल की- बोली ये कैसी आवाज़ है? अब सब बोलने लगे- हां हमने भी सुनी... हमने भी.... खाना सर्व कर रहे वेटर ने बेतकल्लुफ़ी से कहा-अरे ये तो बिल्ली की आवाज़ है. अयं...ऐसी आवाज़ में बिल्ली कब से बोलने लगी!!!
दीपावली
नहीं.....ये बिल्ली नहीं है.....गुर्राहट और तेज़ हो गई.... अब दीवार के उस पार शेर और इस पार हम....जंगल से लगा हुआ रिसोर्ट...हदबंदी के लिये बाड तक नहीं.....हम सब तो थे ही, मेरी भांजी भी साथ में....हे ईश्वर!!! दौड के दोनों बच्चों को किचन में बंद किया. अब सारे वेटर भी डरे हुए....बोले- हां शेर आ तो जाता है यहां...... पिछले दिनों एक लडके को खा गया था.... काटो तो खून नहीं.......टेबल पर जस का तस पडा खाना..... हमने तय किया यहां खडे-खडे मौत का इंतज़ार करने से अच्छा है, अपने काटेज़ की तरफ़ जाना. हमारे कौटेज़ डाइनिंग स्पेस से कम से कम सौ कदम दूर......जंगल का मज़ा देने वाले इस रिसोर्ट पर कोफ़्त हो आई. कल तक जिसकी तारीफ़ करते नहीं थक रहे थे, आज वही मौत का घर दिखाई दे रहा था. खैर....धीरे-धीरे उतरे.... एक-दूसरे का हाथ पकडे किसी प्रकार कौटेज़ तक पहुंचे. आह.... सुकून की लम्बी सांस...... पूरी रात आंखों में कटी. सबेरे जब हम फिर साइटिंग के लिये पहंचे- लोगों को कहते सुना- रात बोखा( मेल टाइगर का नाम) शहर की तरफ़ आया था!!!!!!!!!!

गुरुवार, 15 अक्तूबर 2009

सहेजना रिश्तों का

दीपावली
पिछले दिनों मेरी ननद नीतू, और उनके पतिदेव शिशिर अमेरिका से लौटे। गत चार वर्षो से वेहोनोलुलू में थे। तमाम किस्से वहाँ की संस्कृति, लोग और अन्य मसलों पर खूब-खूब चर्चाएँ हुईं। चर्चा के दौरान ही शिशिर ने बताया कि वहां लोगों का सामान जब पुराना हो जाता है तब वे उसे रोड केकिनारे रख देते हैं, फिर वह चाहे साल भर पुराना हो या छह महीने। नया सामान आने के बाद पुराने की विदाई अवश्यम्भावी है। मज़ा ये की ये सामानछोटा-मोटा नहीं बल्कि टीवी , फ्रिज, कम्प्यूटर, लैपटॉप , क्रॉकरी , आदि आदि होता है। वो भी बहुत अच्छी हालत का।

शिशिर ने बताया की रोड के किनारे ये सामान शुक्रवार तक रखा रहता है। इस बीच यदि किसी व्यक्ति को इस सामान में से कुछ चाहिए तो वो उठा के ले जा सकता है। बाकी सामान को शनिवार को आने वाली म्युनिस्पल की गाड़ी डंप कर ले जाती है। टूटे-फूटे सामन की तरह बेरहमी से उठाते हैं और गाड़ी में पटकते जाते हैं। मेरा दिमाग तो चकरा गया। मुझे गोते खाता देख शिशिर ने बड़े प्यार से समझाया, "भाभी वे ऐसा केवल इसलिए करते हैं क्योंकि उनका मानना है की यदि नए मॉडल का टीवी आ गया है तो पुरानेटीवी को रखने से क्या फायदा? केवल जगह ही घेरेगा न वह....फिर भले ही टीवी एक साल पुराना ही क्यों न हो। हर दिन इलेक्ट्रोनिक में नया कुछ होता रहता है। नई तकनीक को आत्मसात करना ही वहां की संस्कृति है।

हमारे यहाँ जैसे नहीं की बीसों साल पुराना कबाड़ भी गले से लगाए बैठे हैं। इसलिए वहां देखिये, कुछ भी पुराना नहीं।कहीं कबाड़ नहीं। आते समय हम ख़ुद अपना सामान रोड के किनारे रख के आए हैं......."

अमरीकियों का सामान के प्रति निर्मोह मेरे लालच का कारण बन रहा था....सोच रही थी की काश मैं अमेरिका में होती तो पता नहीं कितना सामान समेट लेती.....
हमरिश्तों को भी तो ऐसे ही सहेजते हैं.....जितना पुराना रिश्ता , उतना मजबूत। हमेशा रिश्तों पर जमी धूल भी पोंछते रहो तो चमक बनी रहती है......फिर ये रिश्ते चाहे सगे हों या पड़ोसी से

शिशिर की बातों से शर्मिंदा होते हुए मैंने भी सोचा की आने दो दीवाली , मैं भी वर्षों से जोड़ा गया कबाड़ बाहर करती हूँ।

अंततः दीवाली भी आ गई। मैंने पूरे जोशो-खरोश से सफाई मुहिम संभाली। माया को ललकारा-" निकालो सब सामान अलमारियों से। पता नहीं कितना कबाड़ भरा पड़ा है । फेंको सब।"

माया ने मेरी बिटिया के कमरे की अलमारियों का सामान निकालना शुरू किया- बहुत से छोटे- बड़े पर्स, अलग-अलग डिजाइनों के बैग, ज्योमेट्री बॉक्स , कुछ बड़े-बड़े पॉलीथिन बैग एहतियात से सहेजे हुए से.....कार्ड बोर्ड के बड़े-बड़े डिब्बे जो सुतली से बंधे हुए थे , जिन्हें निश्चित रूप से कई सालों से मैं ही बांधती आरही हूँ।

माया ने पूछा-" दीदी, आप देखेंगी या सब फ़ेंक देना है?" मन नहीं माना। देखना शुरू किया........लगा यहाँ तो यादें बंधी पड़ीं हैं..................


हर साल मैं विधु ( मेरी बेटी) के तमाम सामान ज़रूरत मंदों को दे देती हूँ। बाई के बच्चों को हर साल ढेरों कपडे,स्कूल बैग, जूते, खिलौने और भी बहुत कुछ, लेकिन तब भी कुछ सामन ऐसा है जो मैं सहेज लेती हूँ।

पहला बण्डल खोला, तो उसमें तमाम वे ड्राइंग निकलीं जो उसने स्कूल के शुरूआती दिनों मेंबनाईं थीं, आड़ी-तिरछी लकीरें जो पहली बार खींचीं थीं......फिर बाँध दिया उसे, ज्यों का त्यों......

दूसरा बण्डल......देशबंधु के दिनों में लिए गए तमाम हस्तियों के साक्षात्कारों वाली डायरियां जिनकी अब कोई उपयोगिता नहीं क्योंकि वे प्रकाशित हो चुके हैं,......तमाम इनविटेशन कार्ड्स....तानसेन समारोह, खजुराहो नृत्योत्सव, अलाउद्दीनखां समारोह.......नाट्य समारोह, आकाशवाणी कंसर्ट, और भी पता नहींक्या-क्या....तीसरा बण्डल.......विधु के किचेन सेट, टी-सेट, बार्बी के कपडे, .............

विधु ने कहा रखे रहनेदो.....रख दिए वापस.....चॉकलेट के डिब्बे, जिन्हें उनकी सुंदरता के कारण रखा गया था, सोच के की किसी काम आयेंगे, जो आज तक किसी काम न आ सके, फिर सहेज दिए मिठाई का एक डिब्बा जो इतना खूबसूरत था , कि न मुझसे तीन साल पहले जब आया थे तब फेंका गया, न आज फेंक सकी।

कुछ देने लायक सामान आज भी दिया, लेकिन जो सहेजा था वो वहीं रह गया.............विधु की अलमारी फिर ज्यों की त्यों सामान से भर गई थी। बस फ़र्क सिर्फ़ इतना था की हर सामान पर से धूल हटा दी गई थी। सब कुछ फिर चमकने लगा था.................

मन में कोई शर्मिंदगी भी नहीं थी, कबाड़ न फेंक पाने की। पता नहीं क्यों सामान सहेजते-सहेजते मुझे रिश्ते याद आने लगे.....................

हमरिश्तों को भी तो ऐसे ही सहेजते हैं.....जितना पुराना रिश्ता , उतना मजबूत। हमेशा रिश्तों पर जमी धूल भी पोंछते रहो तो चमक बनी रहती है......फिर ये रिश्ते चाहे सगे हों या पड़ोसी से.....लगा ये विदेशी क्या जाने सहेजना ...... न सामान सहेज पाते हैं न रिश्ते......

"दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं "

बुधवार, 23 सितंबर 2009

गुज़रना ईद का....

ईद
मेरा बचपन जिस स्थान पर गुज़रा वह मध्य-प्रदेश का एक छोटा लेकिन सुंदर सा क़स्बा है-नौगाँव। कस्बा आबादी के लिहाज़ से लेकिन यह स्थान पूर्व में महत्वपूर्ण छावनी रह चुकी है। आज भी यहाँ पाँच हज़ार के आस-पास आर्मी है और अपने क्लाइमेट के कारण आर्मी अफसरों की आरामगाह है। लम्बी ड्यूटी के बाद अधिकारी यहीं आराम करने आते हैं। यहाँ का मिलिट्री इंजीनियरिंग कॉलेज बहुत माना हुआ कॉलेज है।

मगर मैं ये सब क्यों बता रही हूँ? मैं तो कुछ और कहने आई थी....हाँ तो मैं कह रही थी की हम जब नौगाँव पहुंचे तो हमारे यहाँ काम करने जो बाई आई उसका नाम चिंजी बाई था। बहुत हंसमुख और खूबसूरत। पाँच बच्चे थे उसके। चिंजीबाई की आदत थी की जब भी कोई त्यौहार निकल जाता तब लम्बी आह भर के कहती - " दीवाली-दीवाली-दीवाली, लो दीवाली निकल गई।" इसी तरह -" होली-होली होली लो होली निकल गई।"

पता नहीं क्यों आज जबकि ईद को निकले पाँच दिन हो गए हैं,बाई बहुत याद आ रही है। मन बार-बार ' "ईद -ईद-ईद लो ईद निकल गई" कह रहा है....कुछ उसी तरह आह भर के जैसे चिंजी बाई भरा करती थी। मेरी माँ दिल खोल कर देने वालों में हैं लेकिन हो सकता है की चिंजी बाई की हर त्यौहार पर अपेक्षाएं उससे भी ज़्यादा रहतीं हों, जिनके अधूरेपन का अहसास, उसकी उस लम्बी आह भरती निश्वास में रहता हो। क्योंकि इधर कई सालों से ईद पर ऐसा ही खाली पन मुझे घेरता है। और मन बहुत रोकने के बाद भी पीछे की ओर भाग रहा है.......

याद आ रहीं है वो तमाम ईदें, जिन पर हमने भी नए कपडे पहने थे...ईदी मिलने का इंतज़ार किया था.......मीठी सेंवई खाई थी..... और कभी सोचा भी नहीं था की ये त्यौहार मेरा नहीं है। शाम को हम पापा के साथ दबीर अली चाचा के घर सजे-धजे पूरे उत्साह के साथ जाते, सेंवई पर हाथ साफ़ करते और चाचा से ईदी ऐंठते। शम्मोबाजी से लड़ाई लड़ते और चच्ची से डांट खाते।

मेरी मम्मी जब पन्ना में बीटीआई की ट्रेनिंग कर रहीं थीं, तब वे एक मुस्लिम परिवार के यहां किरायेदार के रूप में रहीं वो परिवार भी ऐसा जिसने मेरी मां को हमेशा घर की बेटी के समान इज़्ज़त दी। इतना प्यार दिया जितना शायद मेरे सगे मामा ने भी न दिया हो। लम्बे समय तक हम जानते ही नहीं थे कि पन्ना वाले मामा जी हमारे सगे मामा नहीं हैं। चूंकि उनका नाम हमने कभी लिया नहीं और पूछने की कभी ज़रूरत समझी नहीं। वैसे भी वे हमारे मूर्ख-मासूमियत के दिन थे। किसी के नाम-काम से हमें कोई मतलब ही नहीं होता था। मां ने बताया ये तुम्हारे मामा-मामी हैं बस हमारे लिये ये सम्बोधन ही काफ़ी था।

रमज़ान के दौरान जब कभी मामी नौगांव आतीं तो मेरी मम्मी उनके लिये सहरी और इफ़्तार का बढिया इन्तज़ाम करतीं। साथ में खुद भी रोज़ा रहतीं। एक दिन मैने मामी को नमाज़ पढते देख पूछा- मामी आप मन्दिर नहीं जायेंगी? कमरे में ही पूजा कर लेंगीं? तो मेरी मामी ने बडे प्यार सेसमझाया था-’बेटा, भगवान का वास तो हर जगह है, वे तो इस कमरे में भी हैं तब मुझे मन्दिर जाने की क्या ज़रूरत है?" पता नहीं मेरे नन्हे मन पर इन शब्दों का क्या जादू हुआ कि आज भी मन्दिर जा कर या पूजा-घर में बैठ कर ही पूजा करने के प्रति मेरा लगाव हुआ ही नहीं।

हमारे ये दोनों परिवार सुख-दुख में हमेशा साथ रहे और आज भी साथ हैं। मामा के परिवार की एक भी शादी हमने चूकने नही दी और हमारे यहां के हर समारोह में वे सपरिवार शामिल हुए । आज भी दोनों परिवार उतने ही घनिष्ठ रिश्तों में बंधे हैं। आज रिश्तों की अहमियत ही ख़त्म होती जा रही है। हमारे पड़ोसी भी "चाचा-चाची " होते थे , आज सगे चाचा भी "अंकल" हो गए हैं। मुझे बड़ा अटपटा लगता है जब कोई भी बच्चा बताता ही की उसके अंकल की शादी है या उसे लेने अंकल आयेंगे....आदि । कई बच्चों को तो मैं समझाइश भी दे चुकी हूँ कि वे अपने चाचा को अंकल न कहा करें। लेकिन अब अपने आप को रोक लेती हूँ। किसी दिन कोई कह न दे कि 'आप कौन होती हैं हमारे संबोधनों में संशोधन करने वालीं?'

बात ईद से शुरू की थी और रिश्तों पर ख़त्म हो रही है, मन भी कहाँ-कहाँ भटकता है!

तो बात ईद की कर रही थी तो आज ईद हो या दीवाली या कोई और त्यौहार, वो पहले वाली बात रही ही नहीं। त्योहारों को लेकर उत्साह जैसे ख़त्म होता जा रहा है। रस्म अदायगी सी करने लगे हैं लोग। कोई कहे की मंहगाई के कारण ऐसा हुआ हा तो मैं यह बात सिरे से खारिज करूंगी। जितनी मंहगाई है उतनी ही तनख्वाहें भी तो हैं। पहले की कीमतें कम लगतीं हैं तो वेतन कितना होता था? तब भी लोग इतने उत्साह के साथ हर त्यौहार का इंतज़ार क्यों करते थे? आज हमारे अपने मन उत्साहित नहीं हैं। शायद माहौल का असर हम पर भी पड़ने लगा है।

गुरुवार, 20 अगस्त 2009

मन न भये दस-बीस.....

बहुत दिन हुए , कुछ लिखा नहीं। असल में किसी चैनल विशेष पर प्रसारित होने वाले "सच का सामना" पर लिखना चाहती थी। लेकिन मैं लिखने का मन बनाऊं तब तक कई ब्लॉग्स पर इस कार्यक्रम के बारे में लिखा जा चुका था। फिर आज के परिवेश से जुड़े किसी अन्य मुद्दे पर लिखना चाहा तो ल्लिखने की इच्छा ही नहीं हुई। सच कहूं, तो आज के हालत पर कुछ लिखने मनही नहीं होता। मेरा मन तो है की बस पीछे पीछे और पीछे ही चला जाता है.......आँख बंद करती हूँ तो मन दौड कर पुराने समय में पहुँच जाता है...........याद आने लगते हैं फिल्मों के वो रोड शो....
मैं बहुत छोटी थी तब। लेकिन वे फिल्में जो उस वक्त रोड पर देखीं आज भी याद हैं। तब सूचना और प्रसारण विभाग और परिवार कल्याण विभाग की ओर से फिल्मों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता था।
श्री भानु प्रताप गौर, जिन्हें हम दादा कहते थे उस वक्त जिला न्यायाधीश थे। उनके और हमारे परिवार के बीच घरेलू सम्बन्ध हैं। दादा के दामाद सूचना विभाग में निदेशक जैसे पद पर थे। वे जब भी आते तो विभागीय बस से आते, जिसमें फ़िल्म का प्रोजेक्टर आदि भी होता। उनके आने का मतलब ही था फ़िल्म का प्रदर्शन। ये बस हमें शहर में दिखती और हम बल्लियों उछलने लगते। शाम को दादा का सन्देश आ जाता कि आज फ़िल्म दिखाई जायेगी, सपरिवार आ जायें। सपरिवार ही पहुंचते हम। मेरी मां को छोड्कर। डा. गौर ( दादा के बेटे) अंकल के घर के बाहर आगे ज़मीन में बैठने वालों की व्यवस्था होती और पीछे कुर्सियों पर बैठने वालों। की। अब चूंकि हम आमन्त्रित गण होते थे सो कुर्सियों पर तो बैठना ही था। ऐसे महत्वपूर्ण समय में मेरी निगाह केवल अपने उन साथियों पर होती जो उस वक्त नीचे ज़मीन में बैठे होते थे। वे भी बडी हसरत से मेरी ओर देखते कि शायद अपनी दोस्ती का लिहाज़ कर मैं उन्हें भी अपनी कुर्सी पर बिठा लूं शायद। लेकिन मैं तो उस वक्त उन पर एक घमन्ड भरी नज़र डालती थी, कि देखा! मैं कुर्सी पर बैठी हूं!

रोड शो के उस दौर में ही हमने उपकार , अछूत कन्या , चौथा पलना, धर्मयुद्ध, हकीकत, और बाद में प्रेम रोग जैसी फिल्में देखीं। बहुत छोटी थी लेकिन अछूत कन्या की नायिका देविकारानी से बेहद प्रभावित...(वैसे मैं सभी नायिकाओं से प्रभावित रहती थी) घर में आकर देविकारानी की तरह ’खेत की मूली...बाग कौ आम’ गाना...... दीदी के दुपट्टे को लपेट कर साडी बनाना.....और खुद को देविका रानी समझना। वैसे मैं जब भी कोई फ़िल्म देख कर आती(तब) तो खुद को उसी हीरोइन जैसा समझने लगती। मुझे लगता कि मैं बिल्कुल वैसी ही दिख रही हूं। मेरी चाल-ढाल भी वैसी ही हो जाती। मैं नवीं कक्षा में पढती थी तब तक ऐसी खुशफ़हमियां पाले रहती थी। मूर्ख तो मैं इतनी थी कि ग्यारवीं में पढती थी और तबतक सोचती थी कि ट्रक वाले कितने मूर्ख होते हैं, ट्रक के पीछे लिखते हैं’ horn-please'।
आज अपनी बेटी को ही देखती हूं तो सोचती हूं कि इसकी उम्र में मैं कितनी मासूम थी। केवल पढाई और बेवकूफ़ियां। पढाए तो आजके बच्चे कुछ ज़्यादा ही करते हैं लेकिन मासूमियत?
तमाम चैनल हैं न परिपक्व करने के लिये.

रविवार, 14 जून 2009

दूरदर्शन के दिन

तब दूरदर्शन के शुरूआती दिन थे। कुछ बड़े शहरों में ही टी.वी.टॉवर थे, लेकिन दूरदर्शन की ललक सब के मन में.... तब बहुत कम घर थे जहाँ टेलिविज़न था। हमारे घर भी तभी टैक्सला का बड़ा श्वेत-श्याम टीवी आया। कुछ दिखने के नाम पर केवल झिलमिलाहट और बीच-बीच में कभी अस्पष्ट तो कभी स्पष्ट चित्र दिखाई दे जाता। इस चित्र को भी देखने के लिए छत पर हवाई जहाज सरीखा एंटीना लगाना पड़ता।
हमारे घर जब टीवी आया तब मैं छोटी ही थी। हाथ ठेले पर रखा टीवी जब हमारे घर आया तो उसका किसी मेहमान की तरह स्वागत हुआ। स्वागत करने हम बच्चा पार्टी पहले ही गेट पर खड़े थे। जैसे ही ठेला आया, मैंने सबसे पहले मोहल्ले के अन्य घरों पर एक विहंगम दृष्टि डाली ये देखने के लिए की लोगों ने हमारे घर टीवी आते देखा या नहीं?

उस वक्त जिन घरों में टीवी था वे कुछ विशिष्ट हो गए थे।
हाँतो छत पर बड़ा सा एंटीना लगना पड़ता, और यदि फिर भी तस्वीर न दिखाई पड़े तो एक आदमी को ऊपर चढ़ कर एंटीना घुमाना भी पड़ता था। ऐसा में ऊपर चढा व्यक्ति बार बार पूछ्ता 'आया?' और नीचे बताने के लिए तैनात व्यक्ति बताता की अभी नहीं, और थोड़ा घुमाओ, या बस-बस अब आने लगा। दूरदर्शन की सभाएँ आकाशवाणी की तरह तय थीं, सो सभा आरम्भ होने के पाँच मिनट पहले से ही टीवी खोल दिया जाता। पहले स्क्रीन पर खड़ी धारियां दिखाई देती रहती, फिर दूरदर्शन का मोनो सिग्नेचर ट्यून के साथ घूमता हुआ प्रकट होता। कितना रोमांचक था ये।
सिलसिलेवार कार्यक्रम, गिनती के सीरियल,वो भी पूरे बारह एपिसोड में ख़त्म हो जाने वाले।
मुशायरा, कवि सम्मलेन , बेहतरीन टेलीफिल्म्स ,चित्रहार , पत्रों का कार्यक्रम सुरभि, समाचार, खेती-किसानी क्या नहीं था! फिर शुरू हुआ पहला सोप ऑपेरा हमलोग कोई भूल सकता है क्या? उसके बाद तो एक से बढ़ कर एक सीरियल दूरदर्शन ने दिए। वो बुनियाद हो या प्रथम-प्रतिश्रुति, मालगुडी डेज़ हो या ये जो है ज़िन्दगी, रामायण हो या महाभारत......कितने नाम!!! आज इतने चैनल्स हैं जो दिन-रात केवल सीरियल ही दिखा रहे हैं लेकिन कर पाये रामायण-महाभारत या हम लोग जैसा कमाल? भारत एक खोज या चाणक्य जैसा धारावाहिक दिखने का माद्दा है इनमें? फूहड़ और बेसिर पैर की कहानियों के अलावा और कुछ भी नहीं है अब। ऐसी कहानियाँ जो वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं। ऐसा एक भी चैनल आज नहीं है, जो अपने किसी भी धारावाहिक के ज़रिये कर्फ्यू जैसा सनाका खींच सके। याद है न रामायण और महाभारत के प्रसारण का समय? जिन घरों में टीवी नहीं था वे पड़ोसियों के यहाँ जाकर ये धारावाहिक देखते थे। रविवार के दिन हमें भी ड्राइंगरूम में अतिरिक्त व्यवस्था करनी होती थी। उस पर भी दर्शकों की संख्या इतनी अधिक होती थी, की हम लोगों को ही बैठने की जगह नहीं मिलती थी।

आज चैनलों की इतनी भीड़ है, की टीवी देखने की इच्छा ही ख़त्म हो गई। आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता परोसते धारावाहिक...........ऐसे में दूरदर्शन की बहुत याद आती है।

गुरुवार, 11 जून 2009

राज कर रही है तीन बेटों की माँ?

कल अपने कुछ मेहमानों को छोड़ने स्टेशन गई थी। तभी वहाँ मैंने देखा की एक जर्जर बुढ़िया किसी प्रकार अपने पैर घसीटती संकोच सहित भीख मांग रही है। हालाँकि इसमें नया कुछ भी नहीं है। सैकड़ों बुजुर्ग महिलायें इस प्रकार भीख मांग रहीं हैं। लेकिन मेरे लिए नई बात ये थी की ये वही बूढी अम्मा थी जिसने कई सालों तक हमें हमारे ऑफिस में चाय पिलाई थी।
जाति से कुलीन ब्राह्मणी इस अम्मा के तीन बेटे हैं। तीनों अच्छा-भला कमा रहे हैं। थोडी बहुत ज़मीन भी है। बूढी अम्मा के पति की मृत्यु बहुत पहले हो गई थी , सो अम्मा ने ही अपनी चाय की दूकान के ज़रिये अपने पाँच बच्चों का भरण-पोषण किया। उन्हें पढाया-लिखाया भी। बड़ा लड़का सरकारी नौकरी में है, बीच वाला किसी फैक्टरी में है और तीसरा प्रैस में काम करता है। अम्मा तीसरे के पास ही रहती थी, क्योंकि दो बड़े पहले ही उसे निष्कासित कर चुके थे। लेकिन अब इस तीसरे ने भी उसे घर से निकाल दिया था। जबकि अम्मा घर का पूरा काम करती थी । उम्र अधिक हो जाने के कारण दुकान ज़रूर नहीं चला पाती थी। घर का काम भी अब उतनी फुर्ती से नहीं कर पाती थी। लिहाज़ा उसे घर में रखने योग्य नहीं समझा गया.

अम्मा की मैं हमेशा मदद करती रहती हूँ। वे भी मुझे अपनी बेटी की तरह प्यार करती हैं। मैंने हमेशा कहा है, की वे मेरे पास आके रह सकती हैं। यदि नहीं तो कम से कम यहाँ आकर खाना तो खा ही सकती है ,जिसे खिलाने में उनके तीनों लड़के अब असमर्थ हो गए हैं। लेकिन लड़कों का मोह उन्हें आज भी छोड़ता नहीं। तीन बेटों की माँ यदि भीख माँगने पर मजबूर हो तो बेहतर है, की ऐसे बेटे पैदा ही न हों।
सोचने को मजबूर हूँ, की तमाम बेटों के कारनामे पढ़ने-देखने के बाद भी लोग बेटों की पैदाइश ही क्यों चाहते है?

मंगलवार, 9 जून 2009

श्रद्धांजलि......

आज सुबह का अख़बार शोक संदेश बन कर आया जैसे....रंगमंच के पुरोधा हबीब तनवीर का देहांत और साथ में एक सड़क दुर्घटना में तीन दिग्गज कवियों का निधन.......स्तब्ध हूँ ईश्वर की इस इच्छा पर.....याद आरहे हैं हबीब साहब के साथ बिताये वे दिन जब हम भोपाल में आयोजित नाट्य शिविर में थे....कितनी मेहनत करते थे एक-एक पात्र पर....कितनी डांट खाते थे हम ....फिर याद आए वे दिन जब रीवा में नाट्य शिविर आयोजित हुआ। एक बार फिर वही सिलसिला...लेकिन इस बार मैं केवल सूत्रधार के रूप में थी। नाटक था चरणदास चोर। चार सफल प्रस्तुतियां हुई इसकी। कितनी ऊर्जा थी उनमें!!! खैर अब बस यादें ही शेष....मौत से बड़ा सच दूसरा नहीं।
हबीब साहब ने अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जी, और अपनी बीमारी से ये संकेत भी दिया की अब वे ज़्यादा दिन हमारे बीच नहीं रहेंगे। लेकिन बेतवा महोत्सव से लौट रहे कविगण तो अनायास ही चले गए!! रात में जिन्हें हँसाते रहे, सुबह उन्हें ही रुला दिया!!
हबीब साहब, ओमप्रकाश आदित्य,लाड सिंह और नीरज पुरी को मेरी अश्रुसिक्त श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति और उनके परिवार को संबल दे.

सोमवार, 1 जून 2009

विद्यार्थियों के साथ मज़ाक...

यह मुद्दा है मध्य प्रदेश के शिक्षा-महाविद्यालयों का। वर्ष २००७ में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय ने हमेशा की तरह बी.एड की प्रवेश परीक्षा ली पूरा सत्र बीता और परीक्षाओं का समय आ पहुँचा, लेकिन तभी विश्वविद्यालय ने ६३ शिक्षा-महाविद्यालयों की वैधता पर प्रश्न-चिन्ह लगाते हुए सभी महाविद्यालयों की परीक्षाएं निरस्त कर दीं और इन महाविद्यालयों के संचालक अदालत पहुँच गए वहाँ भी मामले को विचाराधीन कर दिया गया। उल्लेखनीय है, की पूर्व में विश्वविद्यालय ने ही समस्त महाविद्यालयों की सूची संलग्न कर विद्यार्थियों को कॉलेज चुनने की छूट दी थी , बाद में यही कॉलेज अमान्य घोषित कर दिए गए।
अब दो साल बाद कोर्ट ने सभी विद्यार्थियों को परीक्षा में बैठने की अनुमति दी, लेकिन दो दीं बाद ही परीक्षाओं के आगे बढ़ जाने की ख़बर प्रकाशित हुई। इन दो सालों में इन विद्यार्थियों के पता नहीं कितने मौके छूट गए। बी.एड नहीं होने के कारण निजी विद्यालयों तक में इन्हें काम नहीं मिल सका।
सवाल ये है, की अपना इतना नुक्सान करने के बाद अब ये विद्यार्थी विश्वविद्यालय द्वारा घोषित परीक्षाओं में क्यों शामिल हों? क्यों न इन सब को खामियाजे के रूप में बिना परीक्षा के ही बी.एड की डिग्री दी जाए? क्या विद्यार्थिओं के कारण परीक्षाएं टलीं? कॉलेज अमान्य घोषित किए गए इस में विद्यार्थियों का दोष है? यदि नहीं तो अब दो साल बाद वे क्यों परीक्षा दें? मैं आपकी राय चाहती हूं.

गुरुवार, 14 मई 2009

परिवार-दिवस.....!!

तमाम दिवसों को मनाने की परम्परा के तहत आज विश्व परिवार दिवस है। हालांकि भारत में इस प्रकार के दिवसों की उपयोगिता मेरी समझ में नहीं आती क्योंकि हमारे यहाँ परिवार, माँ ,पिता या दोस्तों को भूलने की परम्परा नहीं है। फिर भी जब हम ये दिवस मना ही रहे हैं, तो फिर इन पर चर्चा भी ज़रूरी है।
परिवार दिवस....यानि ये याद दिलाने का दिन हमारा परिवार भी है। परिवार की बात चली तो याद आया की हमारे यहाँ संयुक्त परिवार की कितनी पुरानी परम्परा है, जो अब कई कारणों से छिन्न-भिन्न हो रही है।संयुक्त परिवार यानि दादी -दादा , चाचा-चाची (कई चाचा- चाचियाँ) और ख़ुद के माँ-पिता । घर में बड़े की बात की सुनवाई और किसी को आपत्ति नहीं। धीरे-धीरे समय बदला , लोग बाहर नौकरी पर जाने लगे , जाते पहले भी थे पर अधिकाँश परिवार पीछे ही छोड़ जाते थे, अब अपना-अपना व्यक्तिगत परिवार साथ ले जाने लगे। बाहर रहते परिवार घर के बड़ों की बंदिशों से दूर हो गए। उन्हें आज़ादी अच्छी लगने लगी। सबको अच्छी लगती है। लेकिन इस आज़ादी ने संयुक्त परिवार की गरिमा पर ग्रहण लगाना शुरू किया। अब तो महानगरों में नाम मात्र के संयुक्त परिवार होंगे, जो हैं भी वे मियां - बीबी अपनी नौकरी के स्वार्थ के चलते किसी बड़े को साथ में रखते हैं।
अब एकल परिवार। ये तो माशाल्लाह ही हैं। मियां-बीबी दोनों अपने आप को तुर्रम खां समझते हैं इसी ईगो के चलता रोज़ की बहसें बड़ी लडाइयों का रूप ले लेतीं हैं। पुरूष-प्रधान समाज में महिला घर के लिए आर्थिक , शारीरिक और मानसिक रूप से कितना भी करे, उसे कभी भी ये तारीफ नहीं मिल सकती की उसने घर के लिए कुछ किया। बल्कि उसके हर काम को शक की निगाह से देखने की पुरुषों ने आदत ही बना ली है। हो सकता है, की मेरे कुछ ब्लौगर बंधू मेरी बात से सहमत न हों, लेकिन ये इतना बड़ा सच है, जिसे हर महिला ने झेला है, या झेल रही है। बाहर कितने भी बड़े पद पर रहने के बावजूद घर में उसे निश्चित रूप से अपमानित होना ही पड़ता है। इसके पीछे पुरूष का अपना आहत स्वाभिमान ही है, जो पत्नी की योग्यताओं को स्वीकार नही करना चाहता। लिहाज़ा असर बच्चों पर पड़ता है, और एकल परिवार की अवधारणा यहाँ ध्वस्त होती दिखाई देती है। ऐसे में कहाँ का परिवार और कहाँ का परिवार-दिवस!

रविवार, 10 मई 2009

"माँ" तेरे कितने नाम....


शिशु के शुरूआती शब्द म, या मा जैसे होते हैं, इसीलिए अधिकांश भाषाओँ में "माँ" के लिए प्रयुक्त शब्दों में म की ध्वनि निकलती है। आइये जाने तमाम भाषाओँ में "माँ" को किस-किस तरह से पुकारा जाता है-



  • अफ्रीका- मोइदर, माँ

  • अरब - अम

  • अल्बेनिया- मेमे, नेने, बरिम

  • आयरिश- मदेर

  • बुल्गारिया- माज्का

  • जर्मन- मदर

  • मंगोलियन-इह

  • उर्दू - अम्मी

  • इटली - माद्रे, मम्मा

  • ब्राजील, पुर्तगाल- माई

  • बेलारूस - मैत्का

  • ग्रीक - माना

  • हंगरी - अन्य, फु

  • इंडोनेशिया - इन्दक, इबु

  • जापान - ओकासन , हाहा

  • रोमानिया - मामा , माइका

  • रूस - मेट

  • स्वीडन - ममा , मोर मोरसा

  • युक्रेन - माती

  • भारत- माँ , माता, अम्मा, मैया
(दैनिक भास्कर से साभार )

सोमवार, 4 मई 2009

क्या कूप-मंडूक हैं हम?

नवम्बर माह की बात है, मेरी परिचित एक सुदर्शना युवती, जो हमेशा ही अपने हर मसलों को मेरे पास लाती रही है, और यथासंभव उसके मसलों को मैंने सुलझाया भी है, लिहाज़ा उसका प्रेम मेरे प्रति कुछ ज़्यादा ही था। एक दिन उसने बताया की वह एक लड़के को पसंद करती है, और उसी से शादी भी करना चाहती है। उसने बताया की लड़के का पहले से उसके घर में आना-जाना है, और उसके ( लड़की के) घर वाले लड़के को खूब पसंद करते हैं। लड़का उन्ही की जाति का भी है। मैंने कहा फिर क्या दिक्कत है? हमारे यहाँ अभी भी तयशुदा विवाहों में अंतरजातीय विवाह का चलन नहीं हो पाया है, खास तौर पर सतना जैसे मध्यमवर्गीय मानसिकता वाले शहर में तो बिल्कुल भी नहीं। प्रेम विवाह अब घरेलू स्वीकृति पा जाते हैं, यदि दोनों की जाति समान है तो। लिहाज़ा इस रिश्ते में मुझे कोई अड़चन दिखाई नहीं दी। लेकिन लड़की खासी परेशान थी। उसका कहना था की उसके पापा एक गोत्र विशेष के ब्राहमणों में ही शादी करते हैं, और ये लड़का उस गोत्र का नहीं है।
अब मैं यहाँ लड़के का उल्लेख करना ज़रूरी समझती हूँ, यह लड़का उच्च शिक्षा प्राप्त एक बेहद कुलीन परिवार का बेटा है, जिसके पिता शहर के श्रेष्ठ वकीलों में शामिल हैं। ख़ुद भी अपने व्यसाय में संलग्न है, और अच्छा-खासा कमाता है। यानी एक धनाड्य और सुसंस्कृत परिवार से ताल्लुक रखता है। इस मसले पर पहले तो मैंने लड़के की राय ली बाद में लड़की के पिता को समझाइश देने की सोची । इस बीच लड़के ने अपने घर में बात करली और माँ -पिता को राजी भी कर लिया। लेकिन जब लड़की के पिता से मैं मिली तो उनका रूप देखने लायक था। किसी भी कीमत पर वे इस शादी के लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था की वे भले ही एक बेरोजगार और अनपढ़ से शादी कर देंगे, लेकिन अपने गोत्र से बाहर नहीं जायेंगे। लाख समझाने पर भी बात उनकी समझ में नहीं आई और आनन फानन उन्होंने एक लड़का ढूँढा शादी निपटा दी।
समझ में नहीं आता की इस प्रकार अपनी जिद पूरी करके वे क्या साबित करना चाहते हैं? आज दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और हम अभी तक गोत्र के जाल में ही उलझे हुए हैं!! जातियों का यह वर्गीकरण और उनका बड़प्पन नापने का ये पैमाना मुझे कभी समझ में ही नहीं आया। इतना कुलीन घर-वर छोड़ उनहोंने एक अत्यन्त साधारण परिवार , जो अभी भी सतना जिले के सुदूरवर्ती देहाती इलाके में रहता है, में कर दी। अपनी बेटी को होने वाली तमाम दिक्कतों को भी नज़रंदाज़ कर दिया।

आज भी ऐसे अनेक परिवार हैं, जो पुरानी और ऐसी परम्पराओं में जकडे हुए हैं जिन्हें तोड़ने की पहल होनी ही चाहिए। समान जाति में विवाह करना भले ही अनिवार्यता हो, मगर उसमें भी जाति का गोत्र आदि की अनिवार्यता अवश्य ख़त्म की जानी चाहिए। परिवार संस्कारी और कुलीन है, तो वह बड़ा है। केवल पैसे या जाति विशेष का होने से बड़े होने की पदवी नहीं मिल जाती। बड़ा तो इंसान अपने कर्मों से होता है। क्या इस प्रकार के बंधन कभी टूट पायेंगे?

रविवार, 26 अप्रैल 2009

कैसे-कैसे अंध-विश्वास....

मेरे विद्यालय में बच्चों की छुट्टियाँ शुरू हो गई है, लिहाज़ा स्टाफ को यहाँ-वहां की बातें करने का पर्याप्त समय मिलता है। इसी बतरस के दौरान कल एक बड़ी विचित्र सी बात सामने आई । मेरे विद्यालय की ही एक शिक्षिका ने मुझसे एक व्रत ले लेने की बात कही मेरे पूछने पर उन्होंने बताया की मुझे इस गणेश-व्रत में पन्द्रह दिनों तक उनके द्वारा दी गई व्रत सम्बन्धी दो कहानियाँ और जप करना होगा,पन्द्रह दिनों के बाद मैं जब इस व्रत का प्रसाद जिस भी महिला को दूँगी,उसे भी अगले पन्द्रह दिनों तक यह क्रम दोहराना होगा। और प्रसाद भी किसी एक को नहीं बल्कि चार महिलाओं को देना होगा। फिर इसी प्रकार सिलसिला चलता रहेगा। सुन के मैं सकते में आ गई। इस प्रकार जबरिया व्रत करवाने का मतलब? चूंकि मैं मूर्ति-पूजा करती नहीं सो मैंने न केवल उनसे क्षमा मांग ली,बल्कि इस व्रत के सिलसिले को यहीं समाप्त कर देने की सलाह भी दे डाली।
लेकिन इस किस्से के बाद मेरा मन बहुत दुखी हो गया। उन शिक्षिका महोदया का कहना था की यदि हमने इस व्रत को नहीं किया तो हमारे परिवार पर संकट आ जाएगा। उनकी मंद-बुद्धि में ये बात नहीं आई की संकट तो व्रत करने के बाद भी आ सकता है। हर हिंदू परिवार में पूजा-पाठ होता ही है, तो क्या हम संकटों से बचे रहते हैं?जिन महिलाओं को हम पढ़ा-लिखा समझते हैं, कम से कम उन्हें तो ऐसी अंध-विश्वास से जुड़ी बातों का विरोध करना ही चाहिए। शिक्षित होने के बाद भी यदि हम ऐसी थोथी मान्यताओं में उलझे रहेंगे तो जो सचमुच अशिक्षित महिलाऐं हैं, उन्हें सही रास्ता कौन दिखायेगा? क्या ये महिलाऐं सचमुच शिक्षित हैं? मुझे तो नहीं लगता.....और आपको???

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

ऐसा भी हो रहा है....

मतदान के ठीक एक दिन पहले ही विन्ध्य के एक लोकसभा क्षेत्र में एक प्रत्याशी द्वारा नकली नोट बांटे जाने का सनसनीखेज़ मामला प्रकाश में आया है। एक स्थानीय दैनिक समाचार-पत्र में छपी इस घटना ने उन लोगों के कान खड़े कर दिए हैं, जो पहले ही नकली नोटों की चपेट में आकर चूना लगवा चुके है।
विन्ध्य के रैगांव रामनगर क्षेत्र में घटी इस घटना की जानकारी तब हुई जब एक मजदूर पाँच सौ का नोट लेकर बाज़ार पहुँचा। सतना बाज़ार पहले से ही नकली नोटों की मार झेल रहा है, सो दुकानदार ने उक्त मजदूर से पूछा की उसे ये नोट कहाँ मिला ? मजदूर के अनुसार दो दिन पहले प्रत्याशी महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ रात में दलितों की बस्ती में पहुंचे,फिर वहाँ पहले तो जमकर शराब की दावत दी गई,फिर जब लोग नशे में चूर हो गए तो उन्हें पाँच-पाँच सौ के ये नकली नोट बांटे गए। साथ ही ताकीद की गई की इन नोटों को चुनाव के बाद ही खर्च किया जाए। वो तो उक्त श्रमक को सामन की ज़रूरत थी सो वह वही नोट लेकर आ गया।
इस तरह के मामले होते रहते हैं, लेकिन इस मामले में ख़ास बात ये है की यदि जिला पुलिस अधीक्षक ने तत्परता से काम लिया तो सम्भव है की नकली नोट बनाने वालों की गैंग ही पकड़ जाए। ध्यान देने वाली बात है, कि उक्त प्रत्याशी के पास य नकली नोट कहाँ से आए? क्या उसका ताल्लुक भी इस गैंग या उसके सदस्यों से?
हालांकि जानती हूँ, कल मतदान है, पुलिस-प्रमुख के पास अभी इस मुद्दे पर ध्यान देने का समय ही कहाँ है? और फिर तो हम सब जानते हैं, कि रात गई सो बात गई। फिर कैसा प्रत्याशी कैसे नोट!

मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

कि उनका देखना देखा न जाए........

चुनाव के रंग अब अपने शबाब पर हैं। आचार संहिता के चलते चुनाव-प्रचार पर तो लगाम है, लेकिन कुछ ऐसे परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं कि उनका ज़िक्र किए बिना चैन कहाँ....
फरवरी माह में नगरनिगम सतना ने आम जनता को चेताया था, कि एनिकट में केवल एक हफ्ते का पानी शेष है, इसलिए अब पानी कि सप्लाई सप्ताह में दो दिन ही की जायेगी। चलो ठीक है, पानी मिले यही क्या कम है! मार्च में चुनाव की तारीखें घोषित होने के पहले तक लोगों को हफ्ते में दो दिन ही पानी मिल रहा था। लेकिन इधर प्रत्याशियों की घोषणा हुई और उधर व्यवस्थाओं में परिवर्तन दिखाई देने लगे। इधर पन्द्रह दिनों से रोज़ पानी सप्लाई हो रहा है।
पानी रोज़ मिल रहा है ये तो अच्छा है, लेकिन सवाल ये उठता है, की जब एनिकट में पानी था ही नहीं तो ये पानी जो अब सप्लाई हो रहा है कहाँ से आ रहा है? इसके पहले जनता को जल- संकट का सामना क्यों करना पड़ रहा था? क्या जल-प्रदाय व्यवस्था इसी प्रकार सुचारू नही की जा सकती?
अब दूसरा संकट बिजली का है। साल भर से यहाँ पाँच घंटे की विद्युत् कटौती हो रही है। बीच-बीच में अघोषित कटौती अलग से। पूछने पर जवाब मिलता है, कि अधिक खपत के कारण लाईट अपने आप 'ट्रिप' हो जाती है, जनता लाचार ,क्या कहे जब अपने आप ट्रिप होती है...........लेकिन इधर चुनाव घोषित होते ही देख रही हूँ कि लाईट सुबह दो घंटे फिर दोपहर में केवल एक घंटे ही काटी जा रही है। अघोषित कटौती बंद। लाईट अब 'ट्रिप' क्यों नहीं हो रही??? खपत कम हो गई क्या?? वैसे भी किसी मंत्री को आना होता था तो लाईट कभी भी ट्रिप नही होती थी। ये सारे मुगालते तो केवल जनता के लिए हैं।
अब देखना ये है, कि चुनाव के बाद क्या होता है?

रविवार, 12 अप्रैल 2009

लाचार हैं,शहंशाहे-ग़ज़ल...

शहंशाहे -गज़ल मेंहदी हसन साहब पिछले चार सालों से लकवा ग्रस्त हैं, और अपने बेटों पर आश्रित हैं। चार साल पहले ही वे मुम्बई आए थे इलाज़ के सिलसिले में। अपने पसंदीदा गायक को इस हाल में देख उनके चाहने वालों ने दिल खोल कर मदद की। हसन साहब के बेटों का कहना था कि पैसों के अभाव में उनका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा। हिंदुस्तान में मेंहदी हसन साहब को चाहने वालों की लम्बी फेहरिस्त है, और वे अपने शहंशाह को अभावग्रस्त कैसे देख सकते थे।
आज चार साल बाद भी मेहँदी हसन साहब बिस्तर पर पड़े रहने को मजबूर हैं, क्यों? जबकि देश विदेश से उनके चाहने वाले आर्थिक मदद कर रहे हैं? उनके बेटे लाखों रुपयों में भी उनका इलाज क्यों नहीं करवा पा रहे?
उन रुपयों का क्या कर रहे जो इलाज के लिए आ रहे हैं? क्यों अपने उस पिता के नाम का ग़लत फायदा उठा रहे हैं, जिन्होंने पैसे को कभी महत्त्व ही नहीं दिया? क्यों नहीं उनका ठीक से इलाज करवाते? क्या शहंशाहे -ग़ज़ल , जिसने सब के दिलों पर राज किया को सुकून भरी अन्तिम सांसे नसीब नहीं होंगी ??

गुरुवार, 9 अप्रैल 2009

घमंड

"भीषण झंझावात किसी वृक्ष को आमूल विध्वस्त कर,

हमारे मार्ग को अवरुद्ध कराने इसलिए नहीं डालता ,

कि हम अपनी यात्रा पूरी न कर सकें;

वह तो वृक्ष को उखाड़ कर इसलिए हमारे पथ को अवरुद्ध कर देता है,

कि क्षण भर हमें रोक कर वह यह तो पूछ ले

कि आख़िर हम अपने आप को समझते क्या हैं???"

रविवार, 5 अप्रैल 2009

मायावती और मदर टेरेसा

मायावती जी....उत्तर-प्रदेश की मुख्यमंत्री.....हमेशा कुछ न कुछ ऐसा कर देतीं हैं कि सुर्खियों में आ ही जातीं हैं। अब आज का उनका बयान ही लीजिये. राजनीति में जबरन मेनका गांधी के मातृत्व पर ही उंगली उठा दी। असल में ये तो एक राजनैतिक मुद्दा था, जिसमें अनावश्यक रूप से वरुण गांधी के पालन-पोषण पर आक्षेप लगाया गया. ये किसी भी मां के लिये अंदर तक हिला देने वाली बात होगी, यदि उस पर आरोप लगाया जाये कि उसने बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं दिये. मज़े की बात तो ये कि मायावती जी ने अपनी तुलना मदर टेरेसा से कर डाली!! इससे तो साफ ज़ाहिर है, कि वे अपने आप को मदर टेरेसा जितना महान समझतीं हैं!!! खैर वे कोई भी बयान दें, ये उनका अपना विवेक है,बस खयाल केवल इतना रखें कि भावनात्मक ठेस न पहुंचायें, न ही किसी महा पुरुष से स्वयं की तुलना जैसा हास्यास्पद कार्य करें.

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

क्या होगा अन्जाम....

कल मेरे विद्यालय में बच्चों का परीक्षा-फल घोषित किया गयाकुछ बच्चों ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए तो कुछ कक्षा में पीछे रह गए। ऐसा तो होता ही हैहर बच्चा बराबरी पर तो नहीं ही होतानर्सरी कक्षाओं को छोड़ करअभिवावक भी इन परिणामों से संतुष्ट ही रहते हैं। लेकिन एक विद्यार्थी की माँ ने जो रवैया अपनाया उससे मैं आज भी व्यथित हूँअपने आप को रोक नहीं पाई, लिखने सेवैसे भी दिल का बोझ मैं लिखकर ही उतारती हूँ


तो हुआ ये की कक्षा पाँच के इस विद्यार्थी की माँ ने जैसे ही देखा की उनका बच्चा कक्षा में चौथे स्थान पर है, उन्होंने शिक्षकों पर अनावश्यक दोषारोपण शुरू कर दियाये जाने बिना की उनके बेटे ने प्रश्न-पत्रों में क्या और कितनी गलतियाँ कीं हैंबच्चे के सामने ही उनका आरोप था की उनके बेटे के साथ दुश्मनी निभाई गयी है, उसे जानबूझ कर चौथा स्थान दिया गया। ये अलग बात है, की उनका बेटा वैसे भी दूसरा या तीसरा स्थान ही प्राप्त करता था


हो सकता है, की पूर्व के विद्यालयों में उनका अनुभव कुछ इसी प्रकार का रहा हो; लेकिन हर संस्था को एक ही निगाह से कैसे देखा जा सकता है? पिछले सत्र में ही ये बच्चा हमारी संस्था में आया और मैंने अनुभव किया कि उससे सम्बन्धित हर बात में इस बच्चे की माँ ने अनावश्यक हस्तक्षेप कियाहर बात में बेटे की गलती को नज़र अंदाज़ किया


सवाल ये है कि यदि वे सी तरह अपने बेटे की हर ग़लत बात का पक्ष लेतीं रहेंगीं,तो उस बच्चे या उस जैसे बच्चों का का भविष्य क्या होगा?