रविवार, 6 अगस्त 2017

बातों वाली गली

आप सबकी, ज़िद, दुआओं और रुझान प्रकाशन की असीम अनुकम्पा  से मेरी कहानियां अब पुस्तक रूप में आपके पास पहुंचने को बेताब हैं. लेकिन पहुंचेंगी तभी, जब आप इन्हें मंगवायेंगे 😖 बहुत से साथी ऑर्डर कर चुके हैं, जिन्होंने नहीं किया, उम्मीद है वे भी जल्दी ही प्रति मंगवाने का बंदोबस्त करेंगे.  मैं आज आप लोगों से भी खुल के किताब खरीदने की अपील कर पा रही हूं, क्योंकि मैने  किताबें हमेशा ही खरीद के पढ़ने की आदत डाली है, खासतौर से अपने दोस्तों की किताबें. जब नामचीन लेखकों की किताबें हम खरीद के पढ़ते हैं तो अपने दोस्तों की किताब ही मुफ़्त में क्यों पाना चाहेंगे? है न? तो अब ज़रा जल्दी-जल्दी हाथ चलाइये इस लिंक पर. 

http://rujhaanpublications.com/product/baaton-wali-gali/

बुधवार, 5 जुलाई 2017

गुज़रना ईद का........

मेरा बचपन जिस स्थान पर गुज़रा वह मध्य-प्रदेश का एक छोटा लेकिन सुंदर सा क़स्बा है-नौगाँव। कस्बा, आबादी के लिहाज़ से, लेकिन यह स्थान पूर्व में महत्वपूर्ण छावनी रह चुकी है। आज भी यहाँ पाँच हज़ार के आस-पास आर्मी है और अपने क्लाइमेट के कारण आर्मी अफसरों की आरामगाह है। लम्बी ड्यूटी के बाद अधिकारी यहीं आराम करने आते हैं। यहाँ का मिलिट्री इंजीनियरिंग कॉलेज बहुत माना हुआ कॉलेज है।

मगर मैं ये सब क्यों बता रही हूँ? मैं तो कुछ और कहने आई थी....हाँ तो मैं कह रही थी की हम जब नौगाँव पहुंचे तो हमारे यहाँ काम करने जो बाई आई उसका नाम चिंजी बाई था। बहुत हंसमुख और खूबसूरत। पाँच बच्चे थे उसके। चिंजीबाई की आदत थी की जब भी कोई त्यौहार निकल जाता तब लम्बी आह भर के कहती - " दीवाली-दीवाली-दीवाली, लो दीवाली निकल गई।" इसी तरह -" होली-होली होली लो होली निकल गई।"

पता नहीं क्यों आज जबकि ईद को निकले पाँच दिन हो गए हैं,बाई बहुत याद आ रही है। मन बार-बार ' "ईद -ईद-ईद लो ईद निकल गई" कह रहा है....कुछ उसी तरह आह भर के जैसे चिंजी बाई भरा करती थी। मेरी माँ दिल खोल कर देने वालों में हैं लेकिन हो सकता है की चिंजी बाई की हर त्यौहार पर अपेक्षाएं उससे भी ज़्यादा रहतीं हों, जिनके अधूरेपन का अहसास, उसकी उस लम्बी आह भरती निश्वास में रहता हो। क्योंकि इधर कई सालों से ईद पर ऐसा ही खाली पन मुझे घेरता है। और मन बहुत रोकने के बाद भी पीछे की ओर भाग रहा है.......

याद आ रहीं है वो तमाम ईदें, जिन पर हमने भी नए कपडे पहने थे...ईदी मिलने का इंतज़ार किया था.......मीठी सेंवई खाई थी..... और कभी सोचा भी नहीं था की ये त्यौहार मेरा नहीं है। शाम को हम पापा के साथ दबीर अली चाचा के घर सजे-धजे पूरे उत्साह के साथ जाते, सेंवई पर हाथ साफ़ करते और चाचा से ईदी ऐंठते। शम्मोबाजी से लड़ाई लड़ते और चच्ची से डांट खाते।

मेरी मम्मी जब पन्ना में बीटीआई की ट्रेनिंग कर रहीं थीं, तब वे एक मुस्लिम परिवार के यहां किरायेदार के रूप में रहीं वो परिवार भी ऐसा जिसने मेरी मां को हमेशा घर की बेटी के समान इज़्ज़त दी। इतना प्यार दिया जितना शायद मेरे सगे मामा ने भी न दिया हो। लम्बे समय तक हम जानते ही नहीं थे कि पन्ना वाले मामा जी हमारे सगे मामा नहीं हैं। चूंकि उनका नाम हमने कभी लिया नहीं और पूछने की कभी ज़रूरत समझी नहीं। वैसे भी वे हमारे मूर्ख-मासूमियत के दिन थे। किसी के नाम-काम से हमें कोई मतलब ही नहीं होता था। मां ने बताया ये तुम्हारे मामा-मामी हैं बस हमारे लिये ये सम्बोधन ही काफ़ी था।

रमज़ान के दौरान जब कभी मामी नौगांव आतीं तो मेरी मम्मी उनके लिये सहरी और इफ़्तार का बढिया इन्तज़ाम करतीं। साथ में खुद भी रोज़ा रहतीं। एक दिन मैने मामी को नमाज़ पढते देख पूछा- मामी आप मन्दिर नहीं जायेंगी? कमरे में ही पूजा कर लेंगीं? तो मेरी मामी ने बडे प्यार से समझाया था-’बेटा, भगवान का वास तो हर जगह है, वे तो इस कमरे में भी हैं तब मुझे मन्दिर जाने की क्या ज़रूरत है?" पता नहीं मेरे नन्हे मन पर इन शब्दों का क्या जादू हुआ कि आज भी मन्दिर जा कर या पूजा-घर में बैठ कर ही पूजा करने के प्रति मेरा लगाव हुआ ही नहीं।

हमारे ये दोनों परिवार सुख-दुख में हमेशा साथ रहे और आज भी साथ हैं। मामा के परिवार की एक भी शादी हमने चूकने नही दी और हमारे यहां के हर समारोह में वे सपरिवार शामिल हुए । आज भी दोनों परिवार उतने ही घनिष्ठ रिश्तों में बंधे हैं। आज रिश्तों की अहमियत ही ख़त्म होती जा रही है। हमारे पड़ोसी भी "चाचा-चाची " होते थे , आज सगे चाचा भी "अंकल" हो गए हैं। मुझे बड़ा अटपटा लगता है जब कोई भी बच्चा बताता ही की उसके अंकल की शादी है या उसे लेने अंकल आयेंगे....आदि । कई बच्चों को तो मैं समझाइश भी दे चुकी हूँ कि वे अपने चाचा को अंकल न कहा करें। लेकिन अब अपने आप को रोक लेती हूँ। किसी दिन कोई कह न दे कि 'आप कौन होती हैं हमारे संबोधनों में संशोधन करने वालीं?'

बात ईद से शुरू की थी और रिश्तों पर ख़त्म हो रही है, मन भी कहाँ-कहाँ भटकता है!

तो बात ईद की कर रही थी तो आज ईद हो या दीवाली या कोई और त्यौहार, वो पहले वाली बात रही ही नहीं। त्योहारों को लेकर उत्साह जैसे ख़त्म होता जा रहा है। रस्म अदायगी सी करने लगे हैं लोग। कोई कहे की मंहगाई के कारण ऐसा हुआ हा तो मैं यह बात सिरे से खारिज करूंगी। जितनी मंहगाई है उतनी ही तनख्वाहें भी तो हैं। पहले की कीमतें कम लगतीं हैं तो वेतन कितना होता था? तब भी लोग इतने उत्साह के साथ हर त्यौहार का इंतज़ार क्यों करते थे? आज हमारे अपने मन उत्साहित नहीं हैं। शायद माहौल का असर हम पर भी पड़ने लगा है।

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

नई उम्मीदों की आहट है- "खिड़कियों से..."

जब भी लघु कथाएं पढ़ती हूं, तो चकित होती हूं कि कैसे कोई इतनी बड़ी-बड़ी बातें, जिन्हें लिखने में कहानीकार पृष्ठ दर पृष्ठ भरता चला जाता है, चंद शब्दों में व्यक्त कर पाता है? वो भी इस विशेषज्ञता के साथ कि भाव कहीं भी अपना अर्थ नहीं खोते. दीपक मशाल उन्हीं चंद लघुकथाकारों में से हैं, जो अपनी बात बहुत थोड़े से शब्दों में इस खूबसूरती से बयां कर देते हैं कि पाठक चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाता.  
                                                   दीपक मशाल… ये नाम लेखन की दुनिया के लिये नया नहीं है. साहित्य और उससे जुड़े पाठक इस नाम से बखूबी परिचित हैं. वे अखबारों में, पत्रिकाओं में या फिर अन्तर्जाल पर उनकी रचनाएं पढ़ते रहे हैं. फर्क़ सिर्फ़ इतना है कि अपनी इस पुस्तक “ खिड़्कियों से…” में उन्होंने अपनी बिखरी पड़ी लघुकथाओं को एक जगह कर दिया. उन्हीं के शब्दों में “ठौर दे दिया” . “खिड़कियों से” मेरे पास आ तो गयी थी समय से या शायद कुछ विलम्ब से लेकिन इस पर कुछ लिखने में मुझे ही कुछ अधिक विलम्ब हो गया, जो नहीं होना चाहिये था. विभागीय व्यस्तताओं के चलते ये किताब अब तक पढ़ी ही नहीं जा पा रही थी जबकि समय मिलते ही पढ़ने की उम्मीद में ये मेरे साथ घर से ऑफ़िस और ऑफ़िस से घर का चक्कर लगा रही है एक महीने से. बल्कि मेरे स्टाफ़ ने ही इसे काफ़ी कुछ पढ़ डाला मुझसे पहले. अब जब किताब उठाई तो एक बैठक में पढ़ डाली और लिखने भी बैठ गयी. असल में कोई भी किताब अपने बारे में खुद ही लिखवाती है, ऐसा मेरा मानना है. कई किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ के उन पर लिखने का खयाल तक मन में नहीं आता. और कुछ किताबें ऐसी होती हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद  आप लिखे बिना रह ही नहीं सकते. वे खुद पर लिखे जाने के लिये उकसाती हैं. “खिड़कियों से…” एक ऐसा ही लघुकथा संग्रह है.
“खिड़कियों से…” लघुकथा संग्रह में कुल 91 लघुकथाएं हैं. सभी कथाएं हमारे आस-पास के परिवेश को उजागर करती हैं. हर कहानी से पाठक खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है. जहां एक ओर कहानी  ’बिरादरी’ समाज में व्याप्त थोथे दम्भ को उजागर करती है तो ’यक़ीन’ व्यक्तियों की अलग-अलग मानसिकता को बखूबी उकेरती है. कहानी मरहम “ जा के पांव न फटी विबाई, वो का जाने पीर पराई” कहावत को चरितार्थ करती है. ’सूदसमेत’ इंसानी फ़ितरत की बहुत सूक्ष्म पड़ताल करती है. कई बार लोग इस कहानी के ’उस’ की तरह ही सोचते हैं यदि ऑफ़िस में खन्ना जैसा एटिट्यूड वाला दूसरा अधिकारी आ जाये तो. लेकिन ये भी सच है, कि सभी मातहत/सहयोगी कर्मी, प्यार ’उस’ के जैसे मिलनसार व्यक्ति को ही करते हैं. ’ठेस’ बीमार पुरुष मानसिकता का खुलासा करती है. कहानी ’अपने जैसा’ लोकतंत्र के मौजूदा हाल पर करारा व्यंग्य है. ’बीमा’ पाठक को भीतर तक झकझोरने में सक्षम लघुकथा है. ये एक ऐसी
मनोवैज्ञानिक कथा है जिसे बहुत से बेटों ने झेला होगा. पश्चिमी देशों में रिश्ते हमेशा से अंकल/आंटी में सिमटे रहने वाले रिश्ते अब सीधे-सीधे नाम लेने पर उतर आये हैं. छोटा, बड़ा हर इंसान एक दूसरे का नाम लेता है. पता ही नहीं चलता, कौन किसका क्या है?  भारतीय समाज , जो अपने सम्बोधनों की आत्मीयता के लिये जाना जाता रहा है, अब अंकल-आंटी पर पहुंच चुका है. इसी विषय पर लघुकथा ’ प्रगति’ तगड़ी चोट करती है. ’लहू से गाढ़े’ कथा अलग ही तरह से चमत्कृत करती है.
पसीजे शब्द, माचिस, जानवर, फ़ेलोशिप, बेचैनी, अच्छा सौदा, मुआवज़ा, बौने मन, सभी कथाएं अपने कथ्य को बखूबी पाठक के सम्मुख रखती हैं. सभी कथाओं पर ज़िक्र करना सम्भव नहीं है, वरना हर कथा अपने अलग अन्दाज़ में, एकदम अलग भाव से लिखी गयी है. किसी भी कथा में भाव का, कथानक का दोहराव नहीं हुआ है, जबकि लघुकथा में ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं है. कथा ’सोने की नसैनी’ पुरातन काल से लेकर आज तक , हमारे समाज में चली आ रही बेटी के जन्म की विडम्बना को दर्शाती है. बच्चों पर विद्यालयों का भाषाई आतंक स्पष्ट महसूस किया जा सकता है लघुकथा ’आतंक’ में. ’शिकार’ रोंगटे खड़े कर देने वाली बेहद क्रूर सच्चाई है आज की. निश्चित रूप से ऐसी विभीषिका राजतंत्र हो, या लोकतंत्र  सबमें एक जैसी हैं. बंटवारा, निमंत्रण, कुएं में भांग, अंगुलियां, खेल-ए-लोकतंत्र, ताकतवर,  सभी अपने-अपने मंतव्य को स्पष्ट करती हैं. कहानी ’डर’ का अंत पढ़ कर  पाठक अचानक ही चौंक जाता है. पूरी कहानी में कहीं भी ये आभास ही नहीं होता कि बुज़ुर्ग दम्पत्ति किसी दूसरे की प्रॉपर्टी पर कब्जा जमाये हैं. कमाल का सटायर. सभी लघुकथाएं  एक से बढ़कर एक हैं. इतनी सारी कथाओं पर अलग-अलग चर्चा सम्भव नहीं है. कुछ काम मैं पाठकों पर छोड़ देना चाहूंगी.  
आज जब नई कहानी की विधा को आधुनिक लेखन का पैरोकार मान लिया गया है, नित नये लेखक उलझी हुई भाषा में लिखने को गम्भीर लेखन की निशानी समझने लगे हैं, ऐसे में दीपक मशाल जैसे युवा लघुकथाकार अपनी सरल भाषा और सहज शैली से पाठकों को अवाक करते हैं. पाठकों तक दीपक की बात बहुत आसानी से पहुंचती है. कई कथाएं चंद शब्दों में ही बड़ी-बड़ी बातें व्यक्त करने में सक्षम हैं. पुस्तक के बारे में लिखते हुए प्रसिद्ध कथाकार उदय प्रकाश लिखते हैं- “ इक्कीसवीं सदी के पिछले दो दशकों में लघुकथा का जो विकास हुआ है, दीपक मशाल का इस परिदृश्य में आगमन एक नया कथा-मोड़ है.” अपने प्राक्कथन में रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’ लिखते हैं- ’दीपक मशाल की ये लघुकथाएं इतना तो आश्वस्त करती हैं कि आने वाले समय में लेखक और अधिक नए विषयों का संधान करेगा और शिल्प के क्षेत्र में भी नए द्वार का उद्धाटन करेगा.’ कथाकारद्वय द्वारा ऐसा कहना ही दीपक मशाल की प्रशस्ति और उनकी कथाओं के  लघुकथा-संसार में स्वागत का उद्घोष सा है.  दीपक मशाल को लगातार और सार्थक लेखन के लिये शुभकामनाएं.
“रुझान प्रकाशन” से प्रकाशित “ खिड़कियों से….” लघुकथा संग्रह  का कलेवर बहुत शानदार है. आवरण पृष्ठ बढ़िया है. प्रिंटिंग बहुत अच्छी है. कम समय में ही “रुझान” ने स्थापित प्रकाशकों के बीच  अपनी जो जगह बनाई है वो काबिल-ए-तारीफ़ है. ’रुझान’ को भी अनेकानेक शुभकामनाएं. यह पुस्तक सीधे प्रकाशक से मंगवाने के साथ-साथ फ्लिप कार्ट और अमेज़न पर भी क्रय हेतु उपलब्ध है.

पुस्तक : खिड़कियों से…….
लघु कथा संग्रह
लेखक : दीपक मशाल
प्रकाशक : रुझान प्रकाशन
एस- 2, मैपल अपार्टमेंट, 165
ढाका नगर, सिरसी रोड
जयपुर, राजस्थान- 302012
Mob- 9314073017
मूल्य : 150 रुपये मात्र.
ISBN : 9788193322727




बुधवार, 9 नवंबर 2016

पुराने कालखंड की नई कहानियां: प्रेम गली अति सांकरी

वे अस्सी बरस के हैं.  लेकिन लिख रहे हैं अनवरत. कोई सामान उठाते समय हाथों में कम्पन होता है, लेकिन कलम उठाते वक्त ये कम्पन थम जाता है. सुबह से शाम तक आप उन्हें लगातार लिखते/पढ़ते ही देखेंगे. मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के, हिन्दी साहित्य की दीर्घकालिक सेवा हेतु प्रदत्त प्रतिष्ठित सम्मान “तुलसी सम्मान” से नवाज़े गये श्री आर.आर. अवस्थी यदि इतना चुपचाप, स्वान्त: सुखाय लेखन न कर रहे होते तो कई प्रतिष्ठित सम्मानों के अधिकारी होते.
मैं बात कर रही हूं  मध्य प्रदेश के सुपरिचित कवि/नाटककार/कथाकार श्री रामरतन अवस्थी की. स्वान्त: सुखाय (गद्यगीत), पंछी पंखविहीन (कविता संग्रह), अलका (मेघदूत का छायानुवाद), युग सृष्टा कौटिल्य (नाटक(, कुणाल कथा (नाटक) के बाद  कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है- प्रेम गली अति सांकरी.
ये कहानी संग्रह कई मायनों में महत्वपूर्ण है. सबसे पहला महत्व तो ये कि इस संग्रह में संग्रहीत कहानियां उनके लेखन के शैशवकाल की हैं. पन्द्रह बरस की उम्र में लिखी गयी ये कहानियां सन १९५० से लेकर १९५२ के मध्य की हैं.
पुस्तक के ’आत्म कथ्य’ में अवस्थी जी लिखते हैं – “ शैशव जब बचपन की दहलीज़ पर कदम रखता है और सांसारिकता के ज्ञान का श्री गणेश , मां की गोद में लेटे लेटे ही वह जिस रूप में पाता है, वह “कहानी” का शैशव ही तो है. यही शैशव कदम दर कदम बढ़ते बढ़ते सम्पूर्णता को प्राप्त होकर आज साहित्यिक विधाओं के उच्चासन पर आसीन है, जिसे हम ’कहानी’ के नाम से जानते हैं.”
आत्म कथ्य में ही वे आगे विनीत भाव से लिखते हैं- “ अपने सुधि पाठकों से एक निवेदन कर दूं- इन कहानियों को पढने के पूर्व “कहानी सृजन काल”  के साथ आपको सामंजस्य स्थापित करना होगा. सन पचास-साठ  के दशक में कहानियों का स्वरूप कैसा था, प्रमुख रूप से कथ्य विषय किस प्रकार के हुआ करते थे, लेखन शैली कैसी थी बिम्ब विधान कैसा था आदि, कहानी की उपादेयता तभी सिद्ध  होगी. अस्तु अनुरोध है कि इन कहानियों को तत्कालीन सामाजिक परिवेश के परिप्रेक्ष्य में ही ग्रहण करने की अनुकम्पा करें.”
निश्चित रूप से एक पाठक का ये दायित्व भी है. सच्चा पाठक , किसी भी काल विशेष की रचना और उसकी शैली से बहुत जल्दी तादात्म्य स्थापित कर भी लेता है.  “प्रेम गली अति सांकरी” की कहानियों को पढते हुए पाठक जल्दी  ही उस काल खंड में पहुंच जाता है, जिस काल खंड की ये रचनाएं हैं.
इस कहानी संग्रह में कुल नौ कहानियां संग्रहीत हैं. सात कहानियां सन १९५०-५५  के बीच कीं, जबकि दो कहानियां  इस काल खं से लगभग दो दशक बाद की हैं.
पहली कहानी पुस्तक के शीर्षक वाली कथा है. कहानियों का मूल भाव ’प्रेम’ और इंसानियत  है. ये प्रेम भले ही अलग-अलग पारिवारिक/सामाजिक रिश्तों के बीच का ही क्यों न हो. इस कहानी का मूल आधार भी प्रेम है. प्रकृति वर्णन भी इन कहानियों की एक विशेषता  है, जो अवस्थी  जी के मूलत: कवि होने का परिचय देता है.  कहानी प्रेम गली अति सांकरी,  कर्म क्षेत्रे, एक प्राण, दो देह, इन तीनों कहानियों में किसी न किसी रूप में बैरागी पात्र आया है, सन्यासी या साधु के रूप में.  और ये तीनों सन्यासी जीवन से भाग कर सन्यासी बने. यानि उस काल विशेष में लोग जीवन से हार के आत्महत्या का दामन नहीं थामते थे, बल्कि उनकी जिजीविषा बनी रहती थी, और वे खुद को सकारात्मक ऊर्जा के हवाले कर देते थे. इन तीनों सन्यासियों में एक भी व्यभिचारी नहीं था. प्रेम गली अति सांकरी के सन्यासी ने तो नलिनी जैसी अनिंद्य सुन्दरी का प्रेम निवेदन कुशलता के साथ ठुकराया भी. यानी, उस काल विशेष में सन्यासी सचमुच सांसारिक जीवन से निस्पृह हो जाते थे. आज के सन्यासियों की तरह दोहरा चरित्र नहीं जीते थे. कर्म क्षेत्रे का सन्यासी, मुकेश को घर वापस जाने और अपने कार्य में दोबारा संलग्न होने की सकारात्मक प्रेरणा देता है, आज के तथाकथित सन्यासियों की तरह आश्रम में समर्पित होने के लिये बाध्य नहीं करता. एक तरह से जबरन मुकेश  अपने घर वापस भेजता है सन्यासी . तो उस समय के सन्यासियों पर अपने आप आस्था भाव जगाने का काम करती हैं ये कहानियां.
कहानी ’शहादत’ में हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वर मुखर हुआ है.  दोनों ही सम्प्रदायों के अच्छे और बुरे लोगों को सामने लाने में समर्थ है ये कहानी. विभाजन की विभीषिका उभर कर आई है इस कहानी में.
प्रेम हर काल में वर्जित रहा है ये साबित होता है कहानी “ एक प्राण दो देह “ से. आर्थिक रूप से विपन्न एक माली , सम्पन्न परिवार के युवक को इसलिये स्वीकार्य नहीं कर सका, क्योंकि वो उसकी बेटी को प्रेम करता था. उसी माली ने बेटी को ओगुनी उम्र के प्रौढ के साथ विवाह बंधन में बांधने से गुरेज नहीं किया. यानि प्रेम और लड़कियों की विवशता एक से स्तर पर थी, तब भी कमोवेश आज भी. काम और रिश्तों  के प्रति ईमानदारी, विश्वास और निष्ठा कितनी महत्वपूर्ण होती थी उस समय, ये ज़ाहिर होता है कहानी ’ आबरू’ से. अंग्रेज़ों ने शारीरिक स्तर पर भी कितना शोषण उस समय किया होगा, इस कहानी से एक झलक मिलती है, इस बात की.
संसार में चंद सच्चे इंसान हमेशा मौजूद रहे हैं और शायद इन्हीं सच्चे इंसानों की वजह से इंसानियत भी क़ायम रह सकी, इस बात को पुख्ता करती है कहानी “ सुखिया” . किस तरह भूख प्यास से व्याकुल, मां से बिछड़ा बच्चा एक धनी व्यापारी को मिलता है, और वो उसे किस प्रकार पढा-लिखा के न केवल डॉक्टर बनाता है, बल्कि उसकी सच्चाई भी ज़ाहिर करता है  ताकि ये सुयोग्य युवक अपनी परेशानहाल मां को खोज सके. इस कहानी को पढ के इंसानियत के प्रति मन श्रद्धा से झुक जाता है.  इसी प्रकार कहानी “अन्तर्वेदना” से भी इंसानियत का एक अलग ही रूप सामने आता है. उस काल विशेष में लोगों के भीतर कितना विश्वास था अपने कृत्य पर, और दूसरे इंसान पर भी. एक अजनबी युवक को पिटने से बचाते हुए पिता-पुत्री उसे न केवल  अपने घर ले आये, बल्कि उसकी चिकित्सा भी करवाई. इतना आत्मीय माहौल दिया कि युवक स्वस्थ हो गया. आज के परिवेश में घर लाना तो ऊर, लोग किसी पिटते हुए को बचाने की कोशिश भी नहीं करते.
कहानी “रिसते रिश्ते” अपेक्षाकृत बाद के समय की है सो इसका कथानक भी आज के परिवेश जैसा है. उस समय में रिश्तों में जितना सघन प्रेम था, जुड़ाव था, बाद की कहानी में यही प्रेम, जुड़ाव की सघनता छिन्न-भिन्न होती दिखाई देती है. इस कहानी में बेटी का महत्व भी सामने आता है.  बेटियों के मन में माता-पिता के लिये अधिक प्रेम, चिंता होती है, ये इस कहानी से सिद्ध होता है. सिद्ध ये भी होता है कि कुछ भाव हमेशा एक जैसे रहते हैं. बेटियों का मन तब भी मा बाप के लिये आकुल रहता था, आज भी रहता है. लेकिन अचरज ये कि यही बेटी जब बहू की भूमिका में होती है, तो कैसे पति के माता-पिता के लिये स्नेहरहित हो उठती है. एकल परिवार की परम्परा के आरम्भ की कहानी है ये. आखिरी कहानी है                                     
“राम दुलारे की शव यात्रा” ये कहानी एकदम अलग भाव से लिखी गयी है. तमाम लोगों में, बल्कि अधिसंख्य में ये जानने की तीव्र इच्छा होती है, कि उनकी मौत के बाद कौन कौन उसके लिये दुखी होगा? कौन खुश होगा? किस तरह की बातें लोग करेंगे उसके बारे में? ऐसी ही इच्छा की थी राम दुलारे ने जो नारद जी ने पूरी की और किस तरह के अनुभव राम दुलारे को हुए, ये आप खुद ही पढें, तभी ज़्यादा आनन्द है.
कुल मिला के “प्रेम गली अति सांकरी” एक अलग काल विशेष, भाषा विन्यास और शैली का कहानी संग्रह है, जो निश्चित रूप से पाठक को अपनी ओर आकर्षित करता है. कवर पृष्ठ बहुत शानदार है. ये पुस्तक शिवना प्रकाशन-सीहोर द्वारा प्रकाशित की गयी है, जिसका मूल्य- सौ रुपये मात्र है.
22 मई 1934 को उत्तर प्रदेश के गुढा ग्राम में जमे श्री राम रतन अवस्थी एक ऐसे सम्पन्न कृषक परिवार से हैं, जिसका व्यसन शिक्षण रहा. उत्कृष्ट विद्यालय के प्राचार्य प से सेवा निवृत्त होने के बाद  उन्होंने पूर्णकालिक लेखन को अपनाया. चित्रकला, संगीत और साहित्य के साथ साथ अभिनय में भी उनकी गहरी रुचि रही. मानसी, दशार्ण के स्वर, मयूर जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन भी उन्होंने किया.  साहित्य जगत को वे इसी प्रकार अपनी सतत सेवाएं देते रहें, ऐसी मेरी कामना है. 
“प्रेम गली अति सांकरी” (कहानी संग्रह)
लेखक : रामरतन अवस्थी
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन
पी.सी लैब, सम्राट कॉम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड, सीहोर- 466001 (म.प्र.)
मूल्य : 100 रुपये मात्र
ISBN : 978-93-81520-23-9


 

रविवार, 24 जुलाई 2016

इतना अविश्वास ठीक नहीं......

लाइट गए आधा घण्टा हो गया था। बिजली दफ्तर फोन लगाया तो पता चला लाइट तो चालू है। लगा, स्कूल का फ़्यूज़ उड़ गया क्या? एकबारगी मन में ये भी आया, कि जिस लड़के को बिल दिया था, उसने शायद बिल जमा न किया हो, सो लाइट काट ही दी गयी हो. उस लड़के को फोन लगाया और डपटा कि समय से बिल क्यों नहीं जमा करते? उसने भी धीरे से कहा कि मैम, बिल तो मैं पन्द्रह तारीख को ही जमा कर आया था. थोड़ी ही देर में वो मुझे रसीद भी दे गया. कुछ महीने पहले इसी लड़के ने बिल जमा किया था, लेकिन कम्प्यूटर में फ़ीड नहीं होने के कारण लाइट कट गयी, और रसीद भी इसने ला के नहीं दी थी, सो इस बार ये खुद भी संशय में था. खैर! मैने ये मान लिया था कि लाइट काट दी गयी है. तभी  ऑफिस के ठीक बगल वाली क्लास के एक बच्चे ने टीचर को बताया- "मैम मैं जब टॉयलेट जा रहा था तो मैंने खट की आवाज़ के साथ मेन स्विच नीचे गिरता देखा है। " मैम ने डाँट लगाई- "अच्छा! अपने आप गिर गया मेन स्विच? ज़रूर तुमने बदमाशी की है। बोलो, तुमने ही गिराया है न मेन स्विच?" बच्चा लगातार मना कर रहा है। 
"नो मैम, मेन स्विच तक मेरा हाथ नहीं पहुंचता. फिर मैं क्यों करूंगा ऐसा? मैने नहीं किया."
लेकिन टीचर थीं, कि अब उसे धमकाने के मूड में आ चुकी थीं. 
"सही-सही बताओ, किसने किया, वरना तुम्हारी ही पिटाई होगी." पूरी क्लास सन्नाटे में थी. सब क्लास के शैतान बच्चों की तरफ़ कनखियों से देख रहे होंगे, ये मैने ऑफ़िस में बैठे-बैठे महसूस किया. तभी उस बच्चे की फ़िर आवाज़ आई- " नो मैम . मैं सही कह रहा हूं."
 बच्चे की रुआंसी आवाज़ सुन के मैं क्लास में पहुंची। उस बच्चे की आंखें बता रही थीं, कि वो सच बोल रहा है. क्न्जम्शन बढने पर मेन स्विच अपने आप गिर के पावर कट करता है, ये भी मुझे मालूम था. सो मैने तत्काल उस बच्चे का बचाव करते हुए  सारे बच्चों को मेन स्विच न छूने की हिदायत दे के मामला शांत किया। 
बच्चे के चेहरे और मेन स्विच की ऊंचाई से ज़ाहिर था कि ये हरक़त उसने नहीं की होगी। सोच रही थी, कि खुद ही इस घेरे में फंस जाने के बाद , आगे से मालूम होने पर भी कोई बात न बताने की क़सम, उस बच्चे ने और शायद क्लास के दूसरे बच्चों ने भी खाई हो.... इतना अविश्वास ठीक नहीं। जाने अनजाने, सच को छुपाये रखने की आदत हम बड़े ही तो नहीं डाल रहे बच्चों में? 

गुरुवार, 5 मई 2016

स्वर्गलोक में खलबली....!

स्वर्गलोक में आज बड़ी हलचल थी. हलचल क्या, अफ़रा-तफ़री सी मची थी. किसी को किसी से बात करने की फ़ुरसत तक न थी. हमेशा आराम फ़रमाने, नाच-गान में मस्त-व्यस्त रहने वाले इन्द्रदेव भी अपना मुकुट उतारे, माथे पे हाथ धरे बैठे थे. सुन्दरियां एक ओर सहमी सी खड़ी थीं और सुरा अपने सुराहीदार पात्र  से उचक-उचक के बाहर देखने की कोशिश में थी कि अब तक उसे पिया क्यों नहीं गया?
“टनन..टनन..टनन..टुनुक टन टनन….. घंटी की आवाज़ आनी क्या शुरु हुई, लगा जैसे स्वर्गचाल आ गया. इंद्रदेव को अपना सिंहासन डोलता सा लगा. जबकि वे खुद उस पर बैठे ही नहीं थे. वे तो बाहर पड़े मूढे पर बैठे थे. ये खयाल आते ही उनके माथे पर पड़ी तमाम चिंता की शिकनों में से दो-चार गायब हो गयीं. लम्बी सांस ले के वे उठे और इधर-उधर चहलकदमी करने लगे.  जो देवता सो रहे थे, घंटी की आवाज़ सुन पलंग से नीचे गिरते-गिरते बचे. देवियों ने अपने हाथ का काम छोड़, कान घंटी की आवाज़ पर लगा लिये. कुछ  देवता जाग रहे थे लेकिन घंटी की आवाज़ सुन सोने का नाटक करने लगे. कानों में जबरन एयर प्लग ठूंस लिये. कुछ जो अपने महल  से निकल के अगले के महल तक जा रहे थे, घंटी-ध्वनि कानों में पड़ते ही, बदहवास से अपने महल की ओर वापस दौड़ पड़े.
भक्त की इस घंटी ने उनका जीना हराम कर दिया था. और आज नौबत ये आ पहुंची थी….
नारद जी बहुत देर से ये पूरा नज़ारा स्वर्गलोक के एक कोने से ले रहे थे.ये खलबली देख के उन्हें साल भर पहले धरती पर शिक्षक दिवस के दिन होने वाली अफ़रा तफ़री याद आ गयी. कैसे तो सारे स्कूल उल्टे सीधे हो गये थे… जब उनसे रहा न गया तो सीधे इंद्र के पास पहुंचे. नारद जी को देखते ही इंद्रदेव के चेहरे से गायब हुई शिकनों ने फ़िर वापसी कर ली. नारद जी भांप गये, आखिर अन्तर्यामी जो ठहरे, लेकिन फ़िर भी उन्हें ऐसी शिकनों की आदत थी सो अनदेखी करते खुद ही आसन ग्रहण कर लिये और इंद्रदेव की तरफ़ मुखातिब हुए- “ क्या बात है महाराज! आज यहां बड़ी हलचल मची है… कोई खास बात?? इंद्रदेव तो जैसे इस प्रश्न का ही इंतज़ार कर रहे थे. फट पड़े- “ देखिये मुनिवर, मेरा मुंह न खुलवाइये. एक तो आपने धरती से लेकर स्वर्ग तक खलबली मचा दी और अब पूछ रहे हैं कोई खास बात? इतने भोले न हैं आप कि हमें बताना पड़े बात.. आखिर क्यों किया आपने ऐसा?” अब नारद जी अचकचाये-“ हें!! मैने किया? क्या कर दिया भाई? आपलोगों की तो आदत ही बन गयी है मुझे फंसाने की. कुछ करूं तो और न करूं तो भी. “
“अच्छा! कह तो ऐसे रहे हैं जैसे कुछ जानते ही नहीं.”- इंद्र ने मुंह बिचकाया जो इंद्राणी को एकदम पसंद न आया. बहस में हस्तक्षेप करते हुए बोलीं-“ अब यदि आप समस्या बता ही देंगे तो कौन सा आपका सिंहासन छिन जायेगा. बता दीजिये.”
“देवी, सिंहासन तो छिनवाने की पूरी तैयारी कर दी है नारद महराज ने. अब तुम क्या जानो.” इंद्र बिचके मुंह से बोले. “वही तो…. पत्नियों को बस महल में सजी-धजी पुतली बना के बिठाये रखिये. कोई काम की बात हो, तो फटाक से कह दीजिये- अब तुम क्या जानो. हुंह” इंद्राणी को सचमुच गुस्सा आ गया था. स्वर्ग में औरतों की स्थिति पर वे पहले ही नाखुश थीं. इंद्राणी को रूठते देख इंद्र थोड़ा नरम पड़े. “ प्रिये, तुम तो बस मनवाने के लिये रूठती रहती हो. अभी बिल्कुल टाइम न है मेरे पास मनाने का. सो रूठने का प्रोग्राम पोस्ट्पॉन कर दो.”
“और सुनो महराज, ये खलबली उस चिट्ठी ने मचाई है जो आप विष्णु जी को दे आये हैं. आखिर क्या ज़रूरत थी चिट्ठी सीधे वहां पहुंचाने की? थ्रो प्रॉपर चैनल काम करना रास नहीं आता न आपको? अब आपका तो कुछ नहीं, लेकिन देवताओं को देखिये, कैसे  औंधे-सीधे हुए जा रहे. बेचारों को हाथ हिलाने की आदत नहीं, और आज पूरे के पूरे हिल डुल रहे. दौड़ भाग रहे.   सुना है चिट्ठी में सब देवताओं के नाम मेल जाने की बात है, सो सब लैपटॉप जुगाड़ रहे. स्मार्ट फ़ोन की खेप मंगाई है धरती से लेकिन धरती वाले बहुत भाव खा रहे, कह रहे यहीं नहीं पूज रहे, आपको क्या भेजें? कुछ इंसानों ने तो यहां तक कह दिया की हमारी सुनी है कभी जो हम आपकी सुनें? हमें दी मांगी हुई चीज़? फ़िर हम काहे दें स्मार्ट फ़ोन? सो देवतागण दूसरा जुगाड़ बना रहे. यहीं अंतरिक्ष में लटके सैटेलाइट से सीधा कनेक्शन करवा रहे, यहां की रंगशाला में. आखिर देखें तो माज़रा क्या है. वैसे खोज तो संजय की भी मची है. वही मिल जाता तो क्या कहने थे. सारी झंझट खतम हो जाती. सबके मेल बिना कम्प्यूटर/इंटरनेट के पढ के बता देता.” नारद जी पर बरसने से शुरु हुई इंद्रदेव की बात धीरे-धीरे स्वगत कथन में बदल गयी.
अब नारद जी धीरे से बोले- “ महाराज, मैं तो ब्रह्मा जी का संदेशा ले के आया हूं. विष्णु जी ने वो चिट्ठी टीप लगा के आगे फ़ॉरवर्ड कर दी. सो मामला अब ब्रह्मा जी के हाथ में है. आप सबको आज शाम चार बजे मीटिंग के लिये बुलाया गया है कैलाश पर्वत पर.
“कैलाश पर्वत पर!! जाने क्या सूझता है ब्रह्मा जी को भी.. अब बड़े हैं सो मैं कुछ ऊटपटांग शब्द नहीं बोल रहा वरना मन तो पच्चीसों सुनाने का है. शिव जी को तो ठंड लगती नहीं, उन्हें फ़र्क नहीं पड़ेगा. विष्णु जी हर तरह के मौसम के आदी हैं. खुदई आगे बढ के नारायण पर्वत हथियाये थे बद्रीनाथ में, मने उन्हें भी बर्फ़ से कोई एलर्जी नहीं है. लेकिन हम लोगों की तो सोचो. ये तीनों विभूतियां तो वहां पत्थरासीन हो जायेंगीं, शिवजी के साथ, लेकिन उस पिरामिड सरीखे कैलाश पर्वत पर हम सब कहां रहेंगे जानते हैं न मुनिवर? देखा तो है आपने. जहां-तहां पूरे पर्वत में बर्फ़ के बीच जगह बना के हाथ जोड़े नंगे बदन खड़े रहेंगे. ऐसे में उनके  भाषण पर कम, ठंड पर ज्यादा ध्यान रहेगा. दांत अलग किटकिटायेंगे. और अगर ज्यादा ज़ोर से किटकिटाये तो शोर मचाने का आरोप लगाने में देर न लगेगी उन्हें. इस पर्वत से अच्छा तो धरती का रामलीला मैदान है, जहां कम से कम दर्शक बैठ तो पाते हैं. “ इंद्रदेव कैलाश की ठंड अभी से महसूस करने लगे थे.मौका देख के  नारद जी तत्काल अन्तर्ध्यान हो गये क्योंकि उन्हें मालूम था कि लोग अधिकारियों के खिलाफ़ तो कुछ बोल नहीं पाते, सूचना लाने वाले को ही आड़े हाथों लेते हैं.
देवतागण तीन बजे से ही अपने अपने यानों और सवारियों पर सवार हो के कैलाश पर्वत को कूच करने लगे थे. कइयों ने अपने पद से इस्तीफ़ा लिख के अपने-अपने पीताम्बर/नीलम्बर/श्वेताम्बर की अंटी में खोंस लिया था. इस्तीफ़ा लिखने वाले खासतौर से वे देवता थे, जिनका मेल देखने का कोई जुगाड़ जम नहीं पाया था. जल्दी उड़ान भरने वाले देवताओं ने सोचा था कि वे कैलाश पर्वत पर सबसे आगे की लाइन घेर लेंगे, लेकिन ये उनकी गलतफ़हमी थी. बहुत सारे बिना सवारियों वाले  देवता, दूसरों से लिफ़्ट ले के पहलेई पहुंच गये थे और  आगे की लाइन पर कब्जा जमा चुके थे. बहुत सारे देवता इंद्र के उडान भरते ही एरावत हाथी के पांव से लटक के चेन बना लिये और एरावत के लैंड करने से पहले ही मनचाही जगह पर पांव छोड़-छोड़ के लैंड करते चले गये. ऐसी हरकत पर  बड़े देवताओं ने इसे  नीच कर्म घोषित करते हुए  फ़िर छोटों को अपनी ज़ात दिखा देने का फ़िकरा कसा. और “ कितनी ही सुविधाएं दो इनको, कितनी ही योजनाएं लागू करो इनके लिये, रहेंगे ये छोटे के छोटे” वाला ताना मारा.
खैर. किसी प्रकार सब अपनी अपनी जगह पर खड़े हुए. त्रिमूर्ति कैलाश पर बने पत्थरासन पर विराजमान हो चुकी थी. नारद जी ने सभा शुरु होने की औपचारिक घोषणा की, और ब्रह्मा जी का इशारा पाके बात आगे बढाई.
“ उपस्थित देवियो/देवताओ. जैसा कि आप सब जानते हैं, ये मीटिंग एक बेहद गम्भीर चिट्ठी को लेकर बुलाई गयी है. ये चिट्ठी पृथ्वीलोक से किसी अनन्य भक्त ने भेजी है. यदि परमादरणीय परमपिता ब्रह्मा जी की अनुमति हो, तो मैं इस चिट्ठी का मजमून बांचूं.” ब्रह्मा जी ने हाथ उठाकर चिट्ठी पढने का इशारा किया. नारद जी ने गला खंखार के पढना शुरु किया-
“ आदरणीय त्रिमूर्ति,
सादर प्रणाम. अत्र कुशलम तत्रास्तु. आगे समाचार यह है कि चूंकि चिट्ठी का फ़ॉर्मेट यही है सो मुझे मजबूरीवश “अत्र कुशलम तत्रास्तु” लिखना पड़ा. वरना स्थिति तो ये है कि यहां कुछ भी कुशल नहीं. देश में क्या हो रहा, सो तो आप मुझसे ज़्यादा जानते हैं, सो देश की बात नहीं करनी मुझे. अपन तो सीधे मुद्दे की बात करेंगे. और मुद्दा ये है कि  हम जाने कितने सालों से आप की पूजा कर रहे. हर देवी/देवता को मना रहे लेकिन आप लोग हो कि सुनतेई नईं. आज तक हमारी कोई ख्वाहिश पूरी की? विश्वास न हो तो अपने इच्छापूर्ति रजिस्टर में देख लीजिये. दिखा हमारा नाम?  नहीं न? पिछले दिनों कितना जरूरी काम था हमारा. लेकिन किसी ने न सुनी. हम तो पेटी का भी इंतज़ाम किये थे लेकिन जब कोई सुने तब न? तो हम आज आपको पत्र के माध्यम से नोटिस देते हैं कि हमारी कोई भी इच्छा पूरी क्यों नहीं की गयी. आपके यहां भी धरती की तरह भर्राखाता है क्या? आपकी सरकार भी झूठे वादे करती है क्या? मुझे तो यही लगता है कि  पृथ्वीलोक का असर आपके स्वर्ग में भी हो गया है. उम्मीद है, मेरी चिट्ठी का जवाब जल्दी से जल्दी देंगे अन्यथा मुझे मजबूरन न केवल कानून का , बल्कि किसी और धर्म के देवता का सहारा लेना पड़ेगा.
पुनश्च: - सभी देवताओं से मेरी अर्ज़ी पहुंचने बावत पूछताछ की जाये.
थोड़े लिखे को बहुत समझना. सबको  यथायोग्य कहें.
उत्तर की प्रतीक्षा में
आपका अनन्य भक्त
चिट्ठी पढ के नारद जी ने जैसे ही तहा के ब्रह्मा जी को सौंपी, सभा में सबकी आवाज़ों ने भिनभिनाहट का रूप ले लिया . तभी शिवजी ने अपना त्रिशूल ठोंका. आवाज़ें धीमी होते-होते बंद हो गयीं. ब्रह्मा जी के बायें सिर ने नारद जी को आंखों से इशारा किया, देवताओं से जवाब तलब के लिये.  नारद जी ने देवताओं को इशारा किया उत्तर देने के लिये. इशारा पाते ही सारे देवता त्राहिमाम त्राहिमाम चिल्लाने लगे. कुछ कह रहे थे कि उन्हें मेल मिला ही नहीं तो कुछ कह रहे थे कि उनके पास लैपटॉप नहीं था सो वे मेल चैक ही नहीं कर पाये. शोर इतना बढा कि ब्रह्मा जी के तीनों सिर घूम गये. शिव जी का तीसरा नेत्र खुलने वाला है ऐसा भांप के नारद जी ने बात सम्भाली और देवताओं में से किसी एक को आ के सबकी समस्या बताने को कहा. विष्णु जी ने इंद्रदेव की तरफ़ इशारा किया तो नारद जी ने उन्हें ही तलब कर लिया.
त्रिमूर्ति के आगे आ के इंद्रदेव ने हाथ जोड़ के कहना शुरु किया- “हे त्रिदेव, सभी देवताओं का कहना है कि उन्हें जो मेल मिला है वो खाली था. उस मेल में कुछ लिखा ही नहीं था फ़िर वे क्या मनोकामना पूरी करते? लगभग ८० प्रतिशत देवता हैं जो मेल चैक कर चुके हैं और उनके मेल में कुछ भी नहीं लिखा है. केवल मेल आईडी उनकी डली है.  कुछ देवताओं के पास सीसीटीवी कैमरे की सुविधा है, सो मेरी विनती है कि इस फ़ुटेज़ को देखने के बाद ही हमारे लिये दंड तय किया जाये.”  अबकी विष्णु जी ने प्रोजेक्टर लगाने को कहा. तत्काल कैलाश पर्वत की सफ़ेद बर्फ़ को प्रोजेक्टर के स्क्रीन की तरह तैयार किया गया. फ़ुटेज़ चालू हुआ. लेकिन ये क्या?... ये भक्त तो आसमान की ओर हाथ उठा के लगभग घूमता हुआ जोर जोर से घंटी बजाता  सारे देवताओं से अपनी मुराद पूरी करने को कह रहा. कई देवताओं ने अपना नाम सुनते ही तथास्तु कहने को हाथ भी उठाया, लेकिन तब तक भक्त दूसरे देवता से विनय करता पाया गया. दूसरे देवता ने हाथ उठाया ही था, तथास्तु का “त” बोल भर पाया कि भक्त तीसरे देवता की चिरौरी करने लगा…
पूरा फ़ुटेज़ देखने के बाद इंद्रदेव बोले- देखा भगवन? कैसे कोई इसकी मनोकामना पूरी करे? ये किसी एक के पास टिकता ही नहीं…. सो सब उसकी इच्छा पूरी करने का भार अगले को सौंप देते हैं. बल्कि ये मान लेते हैं कि अगले ने उसकी इच्छा पूरी कर दी होगी. अब बतायें, हम सब कहां दोषी हैं?”
माजरा त्रिदेव की समझ में भी आ गया था. मुस्कुराते हुए नारद जी से बोले- मुनिवर, जो व्यक्ति  किसी एक की भक्ति नहीं कर सकता, किसी एक पर भरोसा नहीं कर सकता उस बेपेंदी के लोटे की कोई इच्छा पूरी कर पाना हमारे वश में नहीं. सो हे नारदमुनि, ऐसी चिट्ठियों को धरती पर ही मंडराने दिया कीजिये . और अगर गलती से ऊपर आ भी गयीं, तो फ़ाड़ के डस्टबिन में डाल दिया कीजिये. इतनी बड़ी सभा जोड़ने की आगे से कोई जरूरत न है. पूरी सभा में से “ त्रिदेव” त्रिदेव” के नारों की आवाज़ तब तक उठती रही, जब तक वे अन्तर्ध्यान न हो गये.




शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

राजनर्तकी की छवि से मुक्ति दिलाने की सार्थक कोशिश है-" एक थी राय प्रवीण"

बुंदेलखंड का इतिहास बहुत समृद्ध है. तमाम कहानियां इसके अतीत में समाहित हैं. यूं तो ऐतिहासिक उपन्यास हमेशा ही रोचक होते हैं लेकिन उनकी रोचकता तब और बढ जाती है जब कथा किसी महत्वपूर्ण राज्य के  नामी गिरामी राजा की प्रेमकथा पर आधारित हो. प्रेम हमेशा से जीवन में उमंग और उत्साह का संचार करने वाला तत्व रहा है, सो जब कथाएं प्रेम पर आधारित होती हैं, तो पाठक का आनन्दित होना लाज़िमी है.
पिछले दिनों श्री गुणसागर सत्यार्थी जी द्वारा रचित ऐतिहासिक उपन्यास “एक थी राय प्रवीण” पढने का सुयोग जुटा. इस उपन्यास से पहले,  राय प्रवीण पर आधारित एक और उपन्यास- “ओरछा की नर्तकी”  मैं पढ चुकी हूं,  वो भी अद्भुत लिखा गया है, लेकिन उस उपन्यास में राय प्रवीण को दरबारी नर्तकी साबित किया गया है, जबकि सच ये है कि राय प्रवीण कभी दरबारी नर्तकी रही ही नहीं. और इस सत्य को बहुत प्रामाणिक तरीक़े से प्रस्तुत करता है उपन्यास- “एक थी राय प्रवीण”.
यह उपन्यास बरधुआं की पुनिया से  ओरछा की राय प्रवीण होने तक का सफ़रनामा बहुत विस्तृत और रोचक तरीके से प्रस्तुत करता है. आमतौर पर ऐतिहासिक उपन्यास बोझिल होने लगते हैं लेकिन सत्यार्थी जी ने इस उपन्यास की रोचकता को उसकी मौलिकता के साथ आरम्भ से अन्त तक बरक़रार रखा.
   यह एक अफ़सोसनाक  सत्य है कि अब तक, राय प्रवीण पर जितना भी लिखा गया, जितने भी उपन्यास लिखे गये, उन सब में उन्हें राजनर्तकी के रूप में वर्णित किया गया. अब चूंकि राजनर्तकी, उस पर राजा इंद्रजीत सिंह की प्रेमिका. तो उपन्यासकारों ने स्वयमेव मान लिया कि यदि कोई नर्तकी प्रेमिका भी है, तो उसकी स्थिति क्या मानी जायेगी? ज़रा स्तरीय भाषा में हम भले ही उसे राजनर्तकी लिखें, लेकिन अन्तत: राजनर्तकी का क्या स्थान होता था दरबार?एक नर्तकी जो राजा की प्रेमिका भी हो को क्या उपाधि दी जा सकती है? रखैल से ज़्यादा कुछ नहीं. चलताऊ भाषा में हम इस रिश्ते को यही नाम देते हैं. लेकिन सत्यार्थी जी का उपन्यास – “एक थी राय प्रवीण” इस मिथक को पूरी तरह नकारता है, और राय प्रवीण को उनकी भार्या के रूप में स्थापित करता है. हां ये सच है कि राय प्रवीण घोषित पत्नी का दर्ज़ा पाने के पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो गयीं. कवि केशव की शिष्या, जिसे स्वयं केशवदास ने राय प्रवीण नाम दिया, कितनी कुशल कवियित्री, नर्तकी, गायिका और चित्रकार थी ये आप इस उपन्यास के माध्यम से जान सकेंगे.
उपन्यास इंद्रजीत की कछौआ यात्रा और  पुनिया की सुरीली आवाज़ के आकर्षण के साथ शुरु होता है. बरधुंआ नाम के एक छोटे से गांव के बहुत गरीब लुहार की बेटी है पुनिया. बिना मां की इस बेटी को ईश्वर ने बहुत सुरीला  गला दिया है. पिता भी संगीत प्रेमी है. किस प्रकार राजा इंद्रजीत इस गरीब बालिका का गायन सुनने के लिये कछौआ में समारोह के दौरान पुनिया का भी गायन रखवाते हैं और वहीं प्रसाद देते हुए प्रसन्न हो भगवान को चढाई जाने वाली माला पुनिया के गले में डाल, उसके आंचल में मिठाई का दोना रख देते हैं. पुनिया ने इस हार को ही वरमाला मान लिया और खुद को राजा इंद्रजीत की पत्नी. आगे की कथा आप उपन्यास में ही पढ्ने का आनन्द है. पुनिया की संघर्ष गाथा और कला के उच्च शिखर पर पहुंचने का सिलसिलेवार वर्णन किया है सत्यार्थी जी ने. सौतिया डाह के चलते रावरानी ने जब अकबर तक राय प्रवीण की खबर भेजी, और अकबर ने जब उसे दरबार में तलब किया तो इंद्रजीत प्रवीण को वहां भेजने के सख्त विरोधी थे. ऐसे में चंद पंक्तियों से राय प्रवीण ने उन्हें समझाया-
 ''आई हों बूझन मंत्र तुमें, निज सासन सों सिगरी मति गोई,
प्रानतजों कि तजों कुलकानि, हिये न लजो, लजि हैं सब कोई। 
स्वारथ और परमारथ कौ पथ, चित्त, विचारि कहौ अब कोई। 
जामें रहै प्रभु की प्रभुता अरु- मोर पतिव्रत भंग न होई।“
 इस पद को पढ के कौन राय प्रवीण को राजनर्तकी या रखैल मानेगा? सत्यार्थी जी ने ऐसे तमाम पद/दोहे इस उपन्यास में उल्लिखित किये हैं जो राजा इंद्रजीत सिंह और राय प्रवीण के रिश्ते को स्पष्ट करते हैं. उपन्यास राय प्रवीण के संघर्ष  को पूरी प्रामाणिकता के साथ सिद्ध करता चलता है. इसीलिये इस उपन्यास को मात्र एक उपन्यास कहना ग़लत होगा. ये सत्यार्थी जी द्वारा रचित शोढ ग्रंथ है. एक ऐसा उपन्यास जिसे आने वाले समय में संदर्भ ग्रंथ के रूप में इस्तेमाल किया जायेगा.  ऐतिहासिक उपन्यास तब प्रामाणिक हो जाते हैं जब उन्हें गहन शोध के बाद लिखा जाता है. इस उपन्यास में भी सत्यार्थी जी के चालीस वर्षों की मेहनत है. छोटे से छोटा तथ्य भी उन्होंने जुटाया, ऐसा तथ्य जो राय प्रवीण की  राजनर्तकी की छवि को मिटा सके. और उनकी मेहनत रंग लाई है. इस उपन्यास को पढने के बाद लोग राय प्रवीण की राजनर्तकी की छवि  को तोड़ पायेंगे.
पूर्व में एक उपन्यास पढा था – “ ओरछा की नर्तकी”  ये उपन्यास इक़बाल बहादुर देवसरे द्वारा रचित है. बहुत बढिया उपन्यास है, लेकिन राय प्रवीण को पूरी तरह राजनर्तकी के रूप में स्थापित करता हुआ. जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है. सत्यार्थी जी ने ऐसे तमाम मिथकों को तोड़ने का सार्थक प्रयास किया है. उपन्यास बहुत रोचक शैली में लिखा गया है. लोक भाषा का समावेश उपन्यास को पात्रों के निकट ले जाने के साथ-साथ उसमें विश्वसनीयता पैदा करता है. ओरछा बुन्देलखंड की प्रमुख रियासतों में से एक है. सो बुन्देली भाषा का  प्रयोग उपन्यास को ज़्यादा प्रामाणिक और आत्मीय बनाने में सफल हुआ है.
उपन्यास की सम्वाद शैली बहुत प्रभावी है, लेकिन कहीं-कहीं बहुत लम्बे सम्वाद हैं, जो पाठक को बोझिल करने लगते हैं. कई लम्बे सम्वाद उपन्यास की मांग के अनुसार हैं. फिर भी लम्बे सम्वादों से बचना उचित होता. लम्बे सम्वाद , उपन्यास की कसावट में सेंध लगाने का काम करते हैं.
“एक थी राय प्रवीण” के रचयिता श्री गुण सागर सत्यार्थी जी का स्थायी निवास कुण्डेश्वर- ज़िला टीकमगढ, म.प्र. में है. आपका जन्म सन- १७ अगस्त सन १९३७ को चिरगांव-झांसी में हुआ. आप मुंशी अजमेरी के पौत्र हैं. सो लिखने का गुण विरासत में मिला, जिसे परम्परा के रूप में वे आगे बढाते रहे हैं. आपने मेघदूत का बुंदेली में काव्यानुवाद किया, जो कालिदास अकादमी उज्जैन द्वारा किया गया.  चौखूंटी दुनिया, नाव चली बाल महाभारत सहित  लगभग ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. तमाम क्षेत्रीय पत्रिकाओं का सम्पादन भी आपके खाते में है. लगभग बीस पांडुलिपियां अभी प्रकाशन के इंतज़ार में हैं. बुन्देलखंड की इस विभूति को पढना ही अपने आप में बुन्देलखंड को जान लेने जैसा है.
नेशनल पब्लिशिंग हाउस-दिल्ली से प्रकाशित “एक थी राय प्रवीण” भी आने वाले समय में बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक साबित होगी, ऐसा मेरा विश्वास है. शुभकामनाओं सहित

उपन्यास: एक थी राय प्रवीण
लेखक: गुण सागर सत्यार्थी
प्रकाशक : नेशनल पब्लिशिंग हाउस
4230/1 अंसारी रोड, दरियागंज
नई दिल्ली- 110002
मूल्य : ७२५ रुपये मात्र